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जन्म के बाद जावेद अख्तर के कान में पिता ने पढ़ा था कम्युनिस्ट पार्टी का मेनिफेस्टो, दिलचस्प कहानी

Published: Mon, 02 Feb 2026 12:18 AM (IST)

जावेद अख्तर ने लखनऊ में एक कार्यक्रम के दौरान अपने जन्म से जुड़ा दिलचस्प किस्सा सुनाया। उन्होंने बताया कि उनके ...और पढ़ें

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HighLights

  1. जावेद अख्तर ने अपने जन्म का अनोखा किस्सा सुनाया।

  2. पिता ने कुरान की जगह कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो पढ़ा था।

  3. लखनऊ में कार्यक्रम के दौरान साझा कीं बचपन की यादें।

जागरण संवाददाता, लखनऊ। मुसलमान परिवार में जब काेई बच्चा जन्म लेता है तो उसके कान में सबसे पहले कुरान की आयतें पढ़कर सुनाई जाती हैं, लेकिन प्रख्यात गीतकार और पटकथा लेखक जावेद अख्तर के साथ ऐसा कुछ नहीं हुआ।

उनके पिता ने कुरान की आयतों की बजाए कम्युनिस्ट पार्टी का मेनिफेस्टो पढ़ दिया था। जावेद अख्तर ने स्वयं यह दिलचस्प किस्सा रविवार को उर्दू अकादमी में सुनाया तो लोग ठहाके लगाने लगे।

कामरेड शंकर दयाल तिवारी मेमोरियल कमेटी की ओर से आयोजित संवाद में वरिष्ठ पत्रकार सुधीर मिश्र ने जावेद अख्तर से उनके जन्म से जुड़ा प्रश्न हुआ तो उन्होंने कहा कि आप मुझे आगे नहीं, पीछे ही लिए जा रहे हैं। इस पर प्रेक्षागृह ठहाकों से गूंज उठा।

फिर जावेद ने वाकया सुनाया- ''''जब ग्वालियर के एक अस्पताल में मेरा जन्म हुआ तो पिता को उनके दोस्त बधाई देने पहुंचे। लोगों ने कहा कि बच्चे का जन्म हुआ है, उसके कान में अजान या कुरान की आयतें पढ़ दीजिए।

पिता ने देखा कि उनके हाथ में कम्युनिस्ट पार्टी का मेनिफेस्टो (घोषणापत्र) है तो उन्होंने वही पढ़ दिया।'''' अख्तर ने अपने पिता के साथ ही दादा, परदादा से जुड़े किस्से भी साझा किए। लखनऊ की बोली की प्रशंसा भी की। कहा, यहां पारंपरिक लोग चाहे मर्द हों या औरत, ''''मैं'''' नहीं, ''''हम'''' बोलते हैं।

प्रश्न हुआ कि आपको पिता जी से विरासत में क्या मिला? जावेद ने कहा, ''''जिस माहौल में बच्चा रहता है, उसे कोई लेक्चर नहीं देता। 15-17 वर्ष की उम्र में बच्चा जो कुछ घर में सीख लेता है, वो किसी कालेज में नहीं पढ़ सकता। यही शायद मेरे साथ हुआ।

मैं जहां भी पला-बढ़ा, वहां से बहुत कुछ सीखा। घर में अक्सर किताबें आती थीं और किताबों की ही बात होती थी। मैं पढ़ता भी खूब था।''''

उन्होंने काल्विन तालुकेदार कालेज में पढ़ाई के दिनों की यादें साझा की। कहा, ''''मेरे कालेज की फीस उस वक्त 17 रुपये थी। ट्यूशन के 15 रुपये लगते थे। जूते 19 रुपये के होते थे। उस दौर में यह बहुत महंगा था। तब हमें सुनाया जाता था कि 17 रुपये वाले स्कूल में पढ़ते हैं। खैराबाद में अपनी ददिहाल से जुड़ी यादें भी बताईं। कहा, ''''वहां केवल एक बार ही गया।''''

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