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नियमितीकरण का अधिकार कर्मचारी की मृत्यु से खत्म नहीं होता: हाई कोर्ट

Published: Sun, 09 Aug 2026 08:36 AM (IST)

लखनऊ हाई कोर्ट ने कहा कि कर्मचारी की मृत्यु से नियमितीकरण का अधिकार समाप्त नहीं होता, बल्कि उसके विधिक उत्तराधिकारियों ...और पढ़ें

हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ। जागरण

हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ। जागरण

HighLights

  1. नियमितीकरण का अधिकार कर्मचारी की मृत्यु से समाप्त नहीं होता।

  2. विधिक उत्तराधिकारी के माध्यम से अधिकार कायम रह सकता है।

  3. मृतक आश्रित नियुक्ति पर विचार करने का निर्देश दिया।

विधि संवाददाता, जागरण, लखनऊ। हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने ग्रामीण अभियंत्रण विभाग में 18 वर्ष से अधिक समय तक सेवा देने वाले दिवंगत वर्कचार्ज कर्मचारी के मामले में महत्वपूर्ण आदेश दिया है। कोर्ट ने कर्मचारी को उस तारीख से नियमित मानने का निर्देश दिया है, जिस तारीख से वह नियमितीकरण के लिए पात्र हुआ था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि नियमितीकरण पर विचार का अधिकार कर्मचारी की मृत्यु के साथ समाप्त नहीं हो जाता। यह अधिकार उसके विधिक उत्तराधिकारियों के माध्यम से भी कायम रह सकता है।

न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ल की एकल पीठ ने संबंधित अधिकारियों को दिवंगत कर्मचारी के बेटे हसन अहमद की मृतक आश्रित के रूप में नियुक्ति के दावे पर भी विचार करने का निर्देश दिया है। अधिकारियों को उत्तर प्रदेश सेवाकाल में मृत सरकारी सेवकों के आश्रितों की भर्ती नियमावली, 1974 के तहत इस दावे पर निर्णय लेना होगा।

कोर्ट ने प्रमाणित आदेश की प्रति प्रस्तुत किए जाने के दो माह के भीतर पूरी प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश दिया है। हसन के पिता रिफाकत हुसैन को एक नवंबर 1985 को ग्रामीण अभियंत्रण विभाग, हरदोई में वर्कचार्ज स्थापना पर कनिष्ठ सहायक के पद पर नियुक्त किया था। 11 अगस्त 2012 को उनकी मृत्यु हो गई। उस समय वह 18 वर्ष से अधिक सेवा पूरी कर चुके थे।

वर्ष 2005 में नियमितीकरण के लिए तैयार वरिष्ठता सूची में उनका नाम 58वें क्रम पर था। कोर्ट ने पाया कि वर्ष 2012 में दैनिक वेतन, वर्कचार्ज और न्यायालयीन मामलों से जुड़े कर्मचारियों के नियमितीकरण के लिए ग्रुप-सी के 172 पद स्वीकृत किए थे। रिफाकत हुसैन भी नियमितीकरण के लिए पात्र थे, लेकिन प्रक्रिया पूरी होने से पहले ही उनकी मृत्यु हो गई। इस बीच समान स्थिति वाले अन्य कर्मचारियों को नियमित कर दिया।

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कोर्ट ने अधिकारियों के रवैये पर कड़ी नाराजगी जताई। कहा कि पहले दिए स्पष्ट न्यायिक निर्देशों के बावजूद याचिकाकर्ता का दावा उसी आधार पर बार-बार खारिज किया गया, जिसे हाई कोर्ट पहले ही अस्वीकार कर चुका था।