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हाई कोर्ट ने 29 साल पुराने हत्या मामले में उम्रकैद का फैसला पलटा, आरोपी बरी

Published: Fri, 11 Sep 2026 09:26 AM (IST)

इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने 29 साल पुराने हत्या के मामले में जिला अदालत के उम्रकैद के फैसले को पलटते हुए अभियुक्त सांभर चाई को बरी कर दिया।

इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ।

इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ।

HighLights

  1. हाई कोर्ट ने 29 साल पुराने हत्या मामले में फैसला पलटा।

  2. अभियुक्त सांभर चाई को उम्रकैद से बरी किया गया।

  3. परिस्थितिजन्य साक्ष्य और स्वीकारोक्ति अविश्वसनीय पाए गए।

विधि संवाददाता, लखनऊ। करीब 29 साल पुराने हत्या के मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने जिला अदालत के उम्रकैद के फैसले को पलटते हुए अभियुक्त सांभर चाई को बरी कर दिया।

कोर्ट ने कहा कि अभियोजन का पूरा मामला परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित था, लेकिन ऐसी परिस्थितियों की पूरी और विश्वसनीय कड़ी पेश नहीं की जा सकी, जिससे अभियुक्त का अपराध संदेह से परे साबित हो। न्यायमूर्ति राजेश सिंह चौहान और न्यायमूर्ति राम मनोहर नारायण मिश्र की पीठ ने यह फैसला सुनाया।

मामला बहराइच के हुजूरपुर थाने में वर्ष 1997 में दर्ज मुकदमे से जुड़ा है। अभियोजन के अनुसार रामबहोर 20 फरवरी 1997 को लापता हुआ था। आरोप था कि सांभर चाई समेत अन्य आरोपितों ने गला दबाकर उसकी हत्या कर दी और शव नदी किनारे रेत में दफना दिया।

घटना के करीब 26 दिन बाद 19 मार्च को एफआइआर दर्ज की गई और अगले दिन शव बरामद हुआ। पोस्टमार्टम में मौत का कारण गला दबाना बताया गया था। विचारण अदालत ने सांभर चाई को हत्या और साक्ष्य मिटाने के आरोप में उम्रकैद समेत अन्य सजा सुनाई थी।

हालांकि, अन्य सहआरोपितों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया गया था। इसके बाद सांभर चाई ने हाई कोर्ट में अपील दाखिल कर सजा को चुनौती दी। पीठ ने पाया कि अभियोजन का प्रमुख आधार अतिरिक्त न्यायिक स्वीकारोक्ति थी। यह बात गवाह बुद्धिसागर ने बताई थी, जो शिकायतकर्ता का बहनोई था। कोर्ट ने कहा कि अभियुक्त और गवाह के बीच ऐसा कोई संबंध या विश्वास का आधार सामने नहीं आया, जिससे करीब एक माह बाद अभियुक्त द्वारा उसके सामने अपराध स्वीकार करने की बात विश्वसनीय लगे।

शव बरामदगी को लेकर भी कोर्ट ने अभियोजन के साक्ष्यों को कमजोर माना। विधिवत बरामदगी मेमो प्रस्तुत नहीं किया गया और विवेचक अदालत में गवाही देने नहीं आया। पुलिस दस्तावेज हेड कांस्टेबल के माध्यम से द्वितीयक साक्ष्य के तौर पर साबित कराए गए।

पीठ ने कहा कि परिस्थितिजन्य साक्ष्य के मामले में सभी कड़ियां इतनी मजबूत होनी चाहिए कि अभियुक्त की निर्दोषता की कोई उचित संभावना न बचे। इस मामले में स्वीकारोक्ति और शव बरामदगी दोनों विश्वसनीय रूप से साबित नहीं हुए। अभियुक्त के खिलाफ हत्या का स्पष्ट उद्देश्य भी स्थापित नहीं किया जा सका। इन आधारों पर हाई कोर्ट ने अपील स्वीकार कर ली और सांभर चाई को किसी अन्य मामले में निरुद्ध न होने पर तत्काल रिहा करने का आदेश दिया। 

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