अंगदान से 30 से अधिक मरीजों को मिला नया जीवन, 21 मृतक अंगदाताओं ने दी नई उम्मीद
उत्तर प्रदेश में पिछले छह वर्षों में 21 परिवारों ने अंगदान कर 30 से अधिक मरीजों को नया जीवन दिया है। संजय गांधी पीजीआई और सोटो द्वारा चलाए गए जागरूकता ...और पढ़ें

अंगदान से 30 से अधिक मरीजों को मिला नया जीवन।

समय कम है?
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जागरण संवाददाता, लखनऊ। किसी परिवार के लिए अपने प्रियजन को खोने का दुख शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता लेकिन, जब वही परिवार अपने दुःख के बीच मानवता का सबसे बड़ा निर्णय लेते हुए अंगदान का संकल्प करता है, तो कई अनजान लोगों के जीवन में नई उम्मीद और नई सुबह का जन्म होता है। छह वर्षों में 21 परिवारों ने ऐसा ही साहसिक निर्णय लिया, जिसके परिणामस्वरूप 30 से अधिक मरीजों को नया जीवन मिल सका।
वर्ष 2020 में कोरोना काल के दौरान संजय गांधी परास्नातक आयुर्विज्ञान संस्थान के अस्पताल प्रशासन विभाग और स्टेट आर्गन एंड टिश्यू ट्रांसप्लांट आर्गेनाइजेशन (सोटो) द्वारा शुरू किए गए जागरुकता अभियान का प्रभाव अब स्पष्ट दिखाई दे रहा है।
सोटो के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2020 से 2026 तक प्रदेश में कुल 21 कैडेवरिक अंगदान हुए हैं। वर्ष 2020 में दो, 2021 में एक, 2022 में छह, 2023 में चार, 2024 शून्य व 2025 एवं 2026 में आठ कैडेवरिक अंगदान हुए हैं।
इन अंगदानों के माध्यम से 30 से अधिक मरीजों को नया जीवन मिला। सबसे अधिक छह कैडेवरिक अंगदान अपोलोमेडिक्स अस्पताल में हुए। इसके बाद केजीएमयू में पांच, एसजीपीजीआइएमएस में तीन, कमांड अस्पताल में दो, जबकि जेपी अस्पताल, नोएडा और आरएमएलआईएमएस में एक-एक अंगदान हुआ।
जागरुकता अभियान ने बदली सोच
स्कूलों, कालेजों, विश्वविद्यालयों और सामाजिक संगठनों में लगातार चलाए गए जागरुकता कार्यक्रमों ने अंगदान को लेकर लोगों की सोच बदली है। ब्रेन डेथ और अंगदान से जुड़ी भ्रांतियों को दूर करने के लिए नियमित जनसंवाद और कार्यशालाएं आयोजित की गईं। सोटो के संयुक्त निदेशक प्रो. राजेश हर्षवर्धन ने इस अभियान को गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
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प्रो. नारायण प्रसाद ने विभिन्न राष्ट्रीय मंचों के माध्यम से अंगदान के प्रति जागरुकता बढ़ाने में उल्लेखनीय योगदान दिया। संस्थान के निदेशक प्रोफेसर आरके धीमान का मार्गदर्शन अंगदान को बढ़ावा देने में सफल रहा है।
पर्दे के पीछे के ये हैं नायक
अंगदान की सफलता में प्रत्यारोपण समन्वयक और काउंसलिंग टीम की भूमिका बेहद अहम रही है। भोलेश्वर पाठक, नीलिमा दीक्षित, संजय सिंह, हरीश चोपड़ा, सचित्रा वी.पी., हिमांशु सिंह तथा अन्य समन्वयकों ने परिवारीजन को समझाकर अंगदान के लिए प्रेरित किया। दरअसल ब्रेन डेड घोषित होने के बाद अंगों की हार्वेस्टिंग, संरक्षण और प्रत्यारोपण एक जटिल प्रक्रिया है।
एसजीपीजीआईएमएस में इंटरनल आर्गन ट्रांसप्लांट कोआर्डिनेशन कमेटी के अध्यक्ष प्रो. नारायण प्रसाद विभिन्न विभागों के बीच समन्वय स्थापित करते हैं, जिससे अंगदान से लेकर प्रत्यारोपण तक की प्रक्रिया समयबद्ध और सफल हो सके।
पेश की मानवता की मिसाल
एसजीपीजीआईएमएस के सेवानिवृत्त कर्मचारी फनीश मणि त्रिपाठी के परिवार ने सड़क दुर्घटना के बाद ब्रेन डेड घोषित होने पर अंगदान का निर्णय लिया। एनेस्थीसिया विभाग की प्रोफेसर एवं कैडेवर ट्रांसप्लांट कोआर्डिनेटर डॉ. सुरुचि और उनकी टीम की काउंसलिंग के बाद हुए इस निर्णय से पांच जरुरतमंद मरीजों को नया जीवन मिला।
एसजीपीजीआईएमएस कर्मचारी महासंघ के अध्यक्ष धर्मेश कुमार और महामंत्री सीमा शुक्ला ने मांग की है कि स्व. फनीश की बड़ी तस्वीर एपेक्स ट्रामा सेंटर और संस्थान की ओपीडी में लगाई जाए। इससे अंगदान के प्रति लोगो में जागरुकता बढ़ेगी।
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