बॉलीवुड में लखनऊ की खुशबू आज भी बरकरार, अब ग्लैमर नहीं कंटेंट का दौर: डाॅ. अनिल रस्तोगी
आदाब अर्ज लखनऊ के 70वें आयोजन में बालीवुड और अवध के रिश्तों पर गहन चर्चा हुई। विशेषज्ञों ने लखनऊ के फिल्मी विरासत और सिनेमा में कंटेंट व अभिनय के बढ़त ...और पढ़ें

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"आदाब अर्ज लखनऊ" में बालीवुड-अवध संबंधों पर चर्चा।
डॉ. अनिल रस्तोगी ने कंटेंट को सिनेमा की ताकत बताया।
लखनऊ अब फिल्मकारों की पसंदीदा शूटिंग लोकेशन बना।
जागरण संवाददाता, लखनऊ। हिंदी सिनेमा और लखनऊ का रिश्ता केवल लोकेशन या नवाबी तहजीब तक सीमित नहीं है। इस शहर ने बालीवुड को कलाकार, गीतकार, संगीतकार और ऐसी सांस्कृतिक विरासत दी है, जिसने भारतीय सिनेमा की पहचान को समृद्ध किया।
रविवार को आदाब अर्ज लखनऊ की ओर से आयोजित विचार-विमर्श 'बालीवुड और अवध' में उभरकर सामने आया। कॉल्विन तालुकेदार्स कॉलेज में आयोजित कार्यक्रम में पद्मश्री डा.अनिल रस्तोगी, वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप कपूर और हेरिटेज इवेंजेलिस्ट (विरासत प्रचारक) जयंत कृष्णा विषय पर बहुत विस्तार से चर्चा की।
पद्मश्री डा. अनिल रस्तोगी ने अपने अभिनय सफर को याद करते हुए कहा कि उन्होंने वैज्ञानिक और अभिनेता, दोनों भूमिकाएं साथ-साथ निभाईं। केंद्रीय औषधि अनुसंधान संस्थान (सीडीआरआइ) में नौकरी के शुरुआती दिनों में रंगमंच को लेकर आशंकाएं थीं, लेकिन संस्थान और वरिष्ठों का भरपूर सहयोग मिला।
कहा कि पहले फिल्मों में ग्लैमर प्रमुख आकर्षण होता था, जबकि आज कंटेंट और अभिनय सबसे बड़ी ताकत बन चुके हैं। कहा इशकजादे जैसी फिल्मों की शूटिंग से लखनऊ के कलाकारों को मुंबई में अवसर मिलने का रास्ता भी खुला।
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गीतकार योगेश गौड़, संतोष आनंद, अभिनेत्री निवेदिता भट्टाचार्य तथा रंगकर्मी अतुल तिवारी जैसी प्रतिभाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि लखनऊ की इन फिल्मी विरासत को राष्ट्रीय स्तर पर और अधिक पहचान दिलाने की जरूरत है।
हेरिटेज इवेंजेलिस्ट (विरासत प्रचारक) जयंत कृष्णा ने कहा कि 1977 की सत्यजीत रे की फिल्म शतरंज की खिलाडी, 1979 में श्याम बेनेगल की जुनून और 1981 में मुजफ्फर अली की उमराव जान फिल्म में जो रिसर्च हुआ, जो काम किया गया, वह अब फिल्मों में देखने को नहीं मिलता।
इन तीनों फिल्मों से लखनऊ की रूह काे पहचाना जाता है। सबसे अहम और खास बात यह रही कि ये फिल्में 1845 से लेकर 1857 तक यानी महज 12 वर्ष की कहानियों पर आधारित रहते हुए फिल्माई गई थी। यह विडंबना है कि सबसे अच्छी फिल्में इन्हीं चार वर्षां में ही बनी, जिनका लखनऊ से बहुत गहरा नाता रहा।
वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप कपूर ने कहा कि एक समय निर्माता-निर्देशक लखनऊ में फिल्म निर्माण की संभावनाओं को लेकर संदेह जताते थे, लेकिन आज यह शहर फिल्मकारों की पसंदीदा लोकेशन बन चुका है।
उन्होंने संगीतकार नौशाद और लखनऊ के फिल्मी इतिहास से जुड़े कई रोचक प्रसंग साझा किए। कार्यक्रम की शुरुआत में दिल्ली से आए माडल एवं फिल्म अभिनेता नासिर अब्दुल्ला की संगीतमय प्रस्तुति से हुई। उन्होंने 1960 के दशक के लोकप्रिय गीत 'पिया तोसे नैना लागे रे' की बांसुरी धुन सुनाकर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।
उन्होंने के एल सहगल के 'सुनो-सुनो हे कृष्ण कन्हैया' और एस.डी. बर्मन के लोकप्रिय गीत 'सुन मेरे बंधु रे' की शैली में गायन प्रस्तुत किया।
इस मौके पर रायल कैफे के प्रबंध निदेशक मुरली आहूजा, कील्विन तालुकेदार्स कॉलेज के प्रधानाचार्य सच्चिदानंद, सलीम खान सहित बड़ी संख्या में साहित्य, संस्कृति और सिनेमा प्रेमी मौजूद रहे। सलीम खान ने जयंत कृष्ण का स्वागत किया। पूरे आयोजन में लखनऊ की तहजीब, संस्कृति और बालीवुड के गहरे रिश्तों की खूबसूरत तस्वीर उभरकर सामने आई।