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    पांच अंतरराष्ट्रीय रिस्क स्कोर तय करेंगे दिल की सेहत, समय रहते टलेगा 'हार्ट फेल्यर' और मौत का खतरा

    Updated: Mon, 15 Jun 2026 06:04 AM (IST)

    संजय गांधी पीजीआई और श्री चित्रा तिरुनल इंस्टीट्यूट के शोध में पांच अंतरराष्ट्रीय रिस्क स्कोर भारतीय मरीजों में हार्ट फेल्यर के खतरे, दोबारा भर्ती होन ...और पढ़ें

    5 अंतरराष्ट्रीय रिस्क स्कोर तय करेंगे दिल की सेहत।

    5 अंतरराष्ट्रीय रिस्क स्कोर तय करेंगे दिल की सेहत।

    HighLights

    1. SGPGI और SCTIMST का संयुक्त महत्वपूर्ण शोध।

    2. पांच अंतरराष्ट्रीय रिस्क स्कोर भारतीय मरीजों के लिए प्रभावी।

    3. समय पर पहचान से हार्ट फेल्यर मृत्यु दर घटेगी।

    कुमार संजय, लखनऊ। हार्ट फेल्यर जैसी गंभीर हृदय बीमारी का खतरा अब पहले ही पहचाना जा सकेगा। संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (एसजीपीजीआई) और तिरुअनंतपुरम स्थित श्री चित्रा तिरुनल इंस्टीट्यूट फार मेडिकल साइंसेज एंड टेक्नोलॉजी (एससीटीआइएमएस) के विशेषज्ञों के संयुक्त अध्ययन में बताया गया है कि पांच अंतरराष्ट्रीय रिस्क स्कोर (जोखिम अंक प्रणाली) भारतीय मरीजों में भी हार्ट फेल्यर के खतरे, दोबारा अस्पताल में भर्ती होने की संभावना और मृत्यु जोखिम का सटीक आकलन कर सकते हैं।

    इस महत्वपूर्ण शोध को इंडियन हार्ट जर्नल ने प्रकाशन के लिए स्वीकार किया है। विशेषज्ञों का मानना है कि इन स्कोर के माध्यम से उच्च जोखिम वाले मरीजों की समय रहते पहचान कर उपचार शुरू किया जा सकेगा, जिससे मृत्यु दर में कमी लाई जा सकती है।

    करीब ढाई वर्ष चले इस अध्ययन में 280 मरीजों को शामिल किया गया। इनमें कुछ ऐसे मरीज थे जिन्हें हार्ट फेल्यर होने का खतरा था, जबकि कुछ पहले से इस बीमारी से पीड़ित थे। शोध के दौरान जोखिम वाले समूह के लगभग 32 प्रतिशत मरीजों में नया हार्ट फेल्यर का मामला आया।

    वहीं पहले से हार्ट फेल्यर से ग्रस्त 37% मरीजों को दोबारा अस्पताल में भर्ती होना पड़ा और करीब नौ प्रतिशत मरीजों की मृत्यु हो गई। अध्ययन में पांच प्रमुख अंतरराष्ट्रीय रिस्क स्कोर हेल्थ एबीसी, टीआरएस-एचएफडीएम, लेस इंडेक्स, मैजिक और एच2एफपीईएफ का मूल्यांकन किया गया। इनमें हेल्थ एबीसी स्कोर भविष्य में हार्ट फेल्यर विकसित होने की संभावना का सबसे बेहतर अनुमान लगाने में प्रभावी पाया गया।

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    मधुमेह से पीड़ित मरीजों के लिए टीआरएस-एचएफडीएम स्कोर अधिक उपयोगी साबित हुआ, जबकि लेस इंडेक्स दोबारा भर्ती होने और मृत्यु के जोखिम का आकलन करने में सबसे बेहतर रहा। विशेषज्ञों के अनुसार यह प्रणाली किसी एक जांच पर आधारित नहीं है।

    इसमें मरीज की उम्र, रक्तचाप, मधुमेह, किडनी की कार्यक्षमता, हृदय की पंपिंग क्षमता, सांस फूलना, शरीर में सूजन, रक्त जांच रिपोर्ट और अस्पताल में भर्ती होने के इतिहास जैसे कई कारकों के आधार पर कुल स्कोर तैयार किया जाता है।

    यह शोध एसजीपीजीआइ के हृदय रोग विभागाध्यक्ष प्रो. डॉ. आदित्य कपूर के नेतृत्व में किया गया। शोध दल का मानना है कि इन रिस्क स्कोर के नियमित उपयोग से चिकित्सक मरीजों की बेहतर निगरानी कर समय पर उपचार शुरू कर सकेंगे और हार्ट फेल्यर से होने वाले गंभीर परिणामों को काफी हद तक रोक सकेंगे।

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