यूपी में ब्राह्मणों के साथ से ही सधेगा सत्ता का ‘समीकरण’, सपा-बसपा भी बना रही जीत का फॉर्मूला
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले सभी राजनीतिक दल ब्राह्मण मतदाताओं को साधने में जुटे हैं, क्योंकि सत्ता के समीकरण में उनका साथ अहम माना जा रहा है। ...और पढ़ें

ब्राह्मणों के साथ से ही सधेगा सत्ता का ‘समीकरण’।
HighLights
यूपी विधानसभा चुनाव में ब्राह्मणों का साथ निर्णायक।
सपा 'पीडीए' में 'पंडित' जोड़कर ब्राह्मणों को लुभा रही।
भाजपा को अपने पारंपरिक ब्राह्मण वोट बैंक की चिंता।
दिलीप शर्मा, लखनऊ। विधान सभा चुनाव से पहले बिछ रही राजनीति की बिसात पर सामाजिक समीकरणों की गोलबंदी को घमासान शुरू हो गया है। राजनीतिक दल पिछड़े-दलितों को जोड़ने में तो जुटे ही है, परंतु उनको खूब अहसास है कि बिना ब्राह्मणों के साथ के, सत्ता पाने की राह आसान नहीं।
अन्य जातीय समीकरणों संग ब्राह्मणों व अन्य सवर्णों के समर्थन से ही भाजपा चुनावी बढ़त बनाए हुए हैं। इससे पहलेे वर्ष 2007 में मायावती ने भी दलित-ब्राह्मणों की सोशल इंजीनियरिंग के सहारे बहुमत की सरकार बनाई थी। ऐसे में भाजपा से ब्राह्मणों की नाराजगी की चर्चाओं के बीच दिख रहे अवसर को समाजवादी भी छोड़ना नहीं चाहती।
ब्राह्मणों को लुभाने में पहले से जुटे सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने अब 'पीडीए' में 'पीडी' को पंडित का शार्ट फार्म बताकर अपनी रणनीति साफ कर दी है।
सपा की कोशिश पीडीए संग ब्राह्मणों की साेशल इंजीनियरिंग से सत्ता दोबारा हासिल करने की है। ब्राह्मणों के 'आशीर्वाद' को सियासत का ये द्वंद अभी और तेज होगा, ऐसे में भाजपा के सामने परंपरागत आधार को एकजुट रखने की चुनौती होगी।
प्रदेश की राजनीति में ब्राह्मण मतदाता 10 प्रतिशत से ज्यादा माने जाते हैं। संख्या से ज्यादा चुनावी लिहाज से यह समाज अहम भूमिका निभाता रहा है। 100 से अधिक सीटों पर ब्राह्मणों का सीधा असर है और अप्रत्यक्ष रूप से यह लगभग पूरे प्रदेश को प्रभावित करते हैं। इसी कारण कोई दल इस वर्ग की अनदेखी का जोखिम नहीं उठाना चाहता।
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वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा की जीत में पीडीए (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) ने भूमिका निभाई थी, परंतु विधान सभा चुनाव के लिए अकेला यही आधार काफी नहीं, इसलिए ब्राह्मणों को जाेड़ने की कोशिश है। अब जनेश्वर मिश्र की जयंती पर सपा प्रमुख ने पीडीए की नई परिभाषा से एक कदम आगे बढ़ा दिया है।
सपा का मानना है कि यदि पीडीए संग ब्राह्मणों का एक हिस्सा भी जुड़ता है तो चुनावी तस्वीर बदल सकती है। ब्राह्मणों का साथ पाने के लिए बसपा भी ताकत झोंक रही है। वर्ष 2007 में बसपा ने ब्राह्मण जोड़ो अभियान चलाया था।
अब मायावती फिर संगठन से लेकर टिकट वितरण में ब्राह्मणों को जगह देकर मजबूती की कोशिश में हैं। इस दौड़ में कांग्रेस भी शामिल है। एक समय प्रदेश में ब्राह्मण उसका बड़ा वोट बैंक रहा है।
विपक्षियों की ये कोशिश भाजपा को बेचैन किए है। ब्राह्मण भाजपा का मजबूत सामाजिक आधार रहे हैं। राम मंदिर आंदोलन के बाद से इस वर्ग का बड़ा हिस्सा भाजपा के साथ रहा है। कुछ समय से समाज की नाराजगी की चर्चाओं के बीच चढ़ावा चोरी आदि मामलों ने भी चुनौती बढ़ाई है।
हालांकि, भाजपा नेतृत्व कहता रहा है कि पार्टी पर ब्राह्मणों का भरोसा कायम है। इसके साथ ही पार्टी ब्राह्मण बुद्धिजीवियों, अधिवक्ताओं, शिक्षकों और धार्मिक संस्थानों से संवाद बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रही है।
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