10 मिनट में बदला नेपाल के लामुसोती का भूगोल, त्रिशूली नदी के उफान में बह गए 28 घर
त्रिशूली नदी में आई अचानक बाढ़ से नेपाल का लामुसोती गांव रेत में दफन हो गया, जिससे 28 घर इतिहास बन गए।

HighLights
त्रिशूली बाढ़ से लामुसोती गांव के 28 घर दफन।
10 मिनट की चेतावनी से ग्रामीणों की जान बची।
ग्रामीण अब रेत में अपने घर का निशान खोज रहे।
रजनीश त्रिपाठी, नेपाल। दस मिनट पहले तक लामुसोती गांव का भूगोल वही था, जिसे 70 साल के लाल प्रसाद नेपाल ने अपनी आंखों के सामने बनते देखा था। फिर त्रिशूली में उफान आया और अगले कुछ मिनटों में 28 घरों की बस्ती इतिहास बन गई। सुबह के 10 बजे हैं।
नदी का पानी उतर चुका है, लेकिन गांव की जमीन अब पहचान में नहीं आ रही। चार से छह फीट ऊंची रेत की परत में घर, आंगन, चूल्हे और वर्षों की जमा यादें दफन हैं। लाल प्रसाद इसी रेत में अपने घर का निशान खोज रहे हैं। तभी एक जंग लगी छड़ दिखाई देती है। वह उसे पकड़ते हैं, आंखें भर आती हैं और कहते हैं, यही मेरा घर है।
नुवाकोट के पहाड़ी भूगोल में त्रिशूली सिर्फ नदी नहीं, यहां के जीवन का हिस्सा रही है। उसके किनारे बसे लामुसोती में पीढ़ियों से घर बनते और परिवार बसते रहे। मगर इस बार नदी ने पानी के साथ गांव की पहचान भी बहा दी।
जहां 28 घर थे, वहां अब रेत का टीला है। घरों की जगह कोई दीवार, दरवाजा और आंगन भी नहीं है। सिर्फ लोहे की वो छड़ें बची हैं, जिन्हें पकड़कर लोग अपने अतीत की पहचान कर रहे हैं।

भूकंप ने दीवारें गिराई थीं, बाढ़ ने घर का निशान ही मिटा दिया
70 वर्षीय लाल प्रसाद कहते हैं कि उन्होंने ऐसी बाढ़ कभी नहीं देखी। बाढ़ आने की सूचना सिर्फ 10 मिनट पहले मिली थी। जब तक संभलने की कोशिश करते, त्रिशूली के तेज बहाव की आवाज सुनाई देने लगी। लगा बचना मुश्किल है।
परिवार के साथ किसी तरह पहाड़ की ओर भागे और जान बच गई। लेकिन नीचे लौटे तो घर नहीं था। अब जिस जगह घर था, वहां खड़े होकर भी वह सिर्फ अनुमान से बता पा रहे हैं कि कभी यहां उनका आंगन हुआ करता था।
कुछ दूरी पर लोकनाथ अपने टूटे घर के मलबे पर बैठे हैं। उनके लिए यह त्रासदी आज से शुरू नहीं हुई। वर्ष 2015 के भूकंप में भी उनका घर तबाह हुआ था। सरकार से मिले तीन लाख रुपये और अपनी बचत की पाई-पाई जोड़कर उन्होंने फिर घर बनाया। अब उसी घर का नामोनिशान मिट चुका है।
रेत को मुट्ठी में भरते हुए कहते हैं, मुझे क्या पता था कि पाई-पाई जोड़कर जिस घर को बनाया, वह एक मिनट में तबाह हो जाएगा। भूकंप ने दीवारें गिराई थीं, बाढ़ ने घर का निशान ही मिटा दिया।
सिल्ट के बीच राजेंद्र नेपाल भी अपने घर की तलाश में हैं। परिवार में सात सदस्य हैं। वह बताते हैं कि सूचना मिलते ही बच्चों को कंधे पर उठाया और पहाड़ की ओर भागे। पीछे मुड़कर देखा तो घर पानी में समा रहा था। उस समय बचने की कोशिश में किसी सामान को उठाने का मौका नहीं मिला। अब लौटकर आए हैं तो रेत में अपने घर की बची चीजें तलाश रहे हैं।
लामुसोती के 28 घरों में अब एक भी रहने लायक नहीं। पूरा गांव पहाड़ के ऊपर बने सामुदायिक भवन में शरण लिए है। महिलाओं ने वहीं चूल्हा जला लिया है। पुरुष दिनभर नीचे उतरते हैं और रेत में बर्तन, कपड़े और लोहे की छड़ें खोजते हैं। जो सामान मिल जाता है, वह उनके लिए सिर्फ सामान नहीं, उस घर की बची हुई पहचान है जो अब जमीन के नक्शे से गायब हो चुका है।
10 मिनट की सूचना ने जिंदगी बचा दी
एक बुजुर्ग महिला कहती हैं, घर तो चला गया, पर जान बची है। यही बहुत है। लेकिन अब जाएं तो जाएं कहां। प्रशासन की टीम जब यहां पहुंची तो मृतकों की संख्या शून्य होने पर राहत की सांस ली। 10 मिनट की सूचना ने जिंदगी बचा दी, लेकिन उसके बाद शुरू हुआ असली सवाल।
इन 28 परिवारों की जिंदगी फिर कहां और कैसे बसेगी। त्रिशूली का पानी उतर चुका है, मगर उसने लामुसोती का पुराना भूगोल अपने साथ ले लिया। अब गांव का इतिहास किसी सरकारी कागज पर दर्ज 28 घरों की संख्या भर नहीं है।
वह रेत में दबे घरों, जंग लगी छड़ों और उन लोगों की आंखों में बचा है, जो कुछ मिनट पहले तक अपने वर्तमान में जी रहे थे और अब अपने अतीत को खोज रहे हैं। जान बचाने में 10 मिनट काफी थे, लेकिन जिंदगी फिर से बसाने के लिए शायद कई महीने भी कम पड़ें।
