महराजगंज में ASI की पहल से जगी उम्मीद, विश्व फलक पर चमकेगा रामग्राम
एएसआई ने महात्मा बुद्ध के रहस्यमयी रामग्राम स्तूप की तलाश में दूसरे चरण की खुदाई को मंजूरी दी है। यह खोज सिद्धार्थनगर-महराजगंज क्षेत्र को वैश्विक बौद् ...और पढ़ें

चौक जंगल में उत्खनन कराने के लिए चयनित कन्हैया बाबा का स्थान। जागरण
HighLights
एएसआई ने रामग्राम स्तूप की दूसरे चरण की खुदाई शुरू की।
उत्खनन से सिद्धार्थनगर-महराजगंज क्षेत्र को नई पहचान मिलेगी।
यह खोज भारत के रामग्राम दावे को और मजबूत करेगी।
विश्वदीपक त्रिपाठी, महराजगंज। महात्मा बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद उनके अस्थि अवशेषों पर बने आठ स्तूपों में से सबसे रहस्यमयी रामग्राम स्तूप की तलाश अब निर्णायक मोड़ पर पहुंचती दिख रही है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआइ) ने पहले चरण के उत्खनन में मिले महत्वपूर्ण साक्ष्यों के बाद दूसरे चरण की खोदाई को मंजूरी दे दी है।
इस बार उत्खनन में ऐतिहासिक प्रमाण मिलते हैं तो न केवल सिद्धार्थनगर-महराजगंज क्षेत्र को विश्व बौद्ध मानचित्र पर नई पहचान मिलेगी, बल्कि वर्षों से रामग्राम को लेकर नेपाल के दावे के मुकाबले भारत का पक्ष भी बेहद मजबूत हो जाएगा।
महात्मा बुद्ध की जन्मस्थली कपिलवस्तु और महापरिनिर्वाण स्थली कुशीनगर के बीच स्थित कन्हैया बाबा स्थान को लंबे समय से रामग्राम स्तूप होने की प्रबल संभावना के रूप में देखा जाता रहा है। इसी दावे की वैज्ञानिक पुष्टि के लिए वर्ष 2025 में एएसआइ ने यहां 10 मीटर की परिधि में लगभग दो महीने तक उत्खनन कराया था।
पहले चरण की खोदाई में कलात्मक दीवारों के अवशेष, प्राचीन ईंटें, मिट्टी के बर्तन तथा दैनिक उपयोग की अनेक वस्तुएं मिली थीं। इनका परीक्षण एएसआइ की विज्ञान शाखा, लखनऊ तथा बीरबल साहनी पुरा विज्ञान संस्थान (बीएसआइपी) में कराया गया। प्रारंभिक अध्ययन में यहां प्राप्त ईंटों को कुषाणकालीन माना गया है। इतिहासकारों का मानना है कि मूल रामग्राम स्तूप को कोलीय गणराज्य के प्रशासकों ने मिट्टी से बनवाया था, जिसकी बाद के कालखंडों में मरम्मत होती रही और कुषाणकाल में इसे ईंटों से सुदृढ़ किया गया।
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इन्हीं साक्ष्यों के आधार पर एएसआइ ने अब दूसरे चरण के उत्खनन को मंजूरी दी है। इस बार खुदाई का दायरा पहले की तुलना में लगभग पांच गुना बढ़ाया गया है। विशेषज्ञों को उम्मीद है कि विस्तृत उत्खनन से स्तूप की वास्तविक संरचना, उसके कालक्रम और ऐतिहासिक पहचान से जुड़े निर्णायक प्रमाण सामने आ सकते हैं।

यदि दूसरे चरण की खुदाई में रामग्राम स्तूप की पुष्टि करने वाले ठोस पुरातात्विक प्रमाण मिलते हैं तो यह खोज केवल एक ऐतिहासिक विवाद का समाधान नहीं करेगी, बल्कि सिद्धार्थनगर-महराजगंज क्षेत्र को वैश्विक बौद्ध पर्यटन का नया केंद्र बनाने की दिशा में भी निर्णायक कदम साबित होगी।
इससे अंतरराष्ट्रीय बौद्ध सर्किट को नया आयाम मिलेगा और भारत का ऐतिहासिक दावा भी पहले से कहीं अधिक मजबूत होगा। रामग्राम की वास्तविक स्थिति को लेकर भारत और नेपाल के बीच लंबे समय से अलग-अलग दावे किए जाते रहे हैं। नेपाल के पुरातत्वविद नवलपरासी जिले के उज्जयनी क्षेत्र को रामग्राम बताते हैं।
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रामग्राम से अवशेष नहीं ले जा सके थे अशोक
बौद्ध परंपरा के अनुसार ईसा पूर्व 483 में बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद अस्थि अवशेष आठ भागों में विभाजित किए गए थे और उन पर आठ स्तूप बनाए गए थे। दिव्यावदान सहित अनेक बौद्ध ग्रंथों में उल्लेख है कि सम्राट अशोक ने सात स्तूपों से अस्थि अवशेष निकलवाकर विभिन्न स्थानों पर नए स्तूपों का निर्माण कराया था। वह रामग्राम पहुंचे तो लोगों के विरोध और नागवंशीय कोलियों के संरक्षण के कारण सफलता नहीं मिली। बौद्ध दार्शनिक एवं कवि अश्वघोष ने भी अपने ग्रंथ बुद्धचरित में इसका उल्लेख किया है।