नारायणी से निकल रहे गृहस्थी के निशान, हर लकड़ी सुना रही है उजड़े घर की कहानी
नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ का मलबा नारायणी गंडक नदी के रास्ते महाराजगंज के निचलौल घाटों पर पहुंच रहा है। ...और पढ़ें

नदी किनारे गांव के लोग नाव द्वारा नदी से निकाल रहे लकड़ियां
HighLights
नेपाल बाढ़ का मलबा नारायणी गंडक में पहुंचा।
निचलौल घाटों पर मिल रहे घरों के टूटे निशान।
बहकर आए सामान उजड़ी गृहस्थी की कहानी बयां कर रहे।
प्रदीप कुमार गौड़, निचलौल। जिस घर को बनाने में किसी परिवार ने जिंदगी भर की कमाई लगा दी, जिस चौखट पर बच्चों ने अपना बचपन बिताया और जिस चारपाई पर बैठकर परिवार ने सुख-दुख बांटे, आज उसी गृहस्थी के निशान नारायणी गंडक नदी के किनारे बिखरे पड़े हैं। नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ अपने साथ न जाने कितने परिवारों के आशियाने और गृहस्थी का सामान बहा लाई। त्रिशूली नदी के रास्ते नारायणी गंडक में पहुंचे ये सामान अब भारत में प्रवेश कर महाराजगंज जिले के निचलौल क्षेत्र के घाटों पर दिखाई दे रहे हैं।
नदी किनारे पहुंचे लोग इन्हें देखकर जहां जरूरत का सामान निकाल रहे हैं, वहीं टूटे दरवाजे और चौखट किसी अनजान परिवार की उजड़ी दुनिया की कहानी भी बयां कर रहे हैं।
बुधवार सुबह करीब सात बजे भेड़िहारी निवासी अलगू एनसी (नारायणी-छितौनी) बांध के घाट पर नदी से लकड़ी निकाल रहे थे।
उन्हें नदी में घर के दरवाजे, चौखट, चारपाई और तख्त के टूटे हिस्से मिले। अलगू ने बताया कि बाढ़ आने के बाद से ही वह नदी किनारे आ रही लकड़ियों को निकाल रहे हैं। इनमें अधिकांश लकड़ियां और घर में उपयोग होने वाले सामान हैं। लकड़ियों का उपयोग जलौनी समेत अन्य घरेलू कार्यों में किया जा सकता है।
नाव से नदी में उतरकर लकड़ी निकाल रहे लल्लन, उदयभान और रूदल ने बताया कि नारायणी के बीच पाटा तक नाव ले जाकर ऊंचे स्थानों पर अटकी लकड़ियों को निकाला जा रहा है। कई जगह घर में इस्तेमाल होने लायक सामान भी मिल जाता है। उनका कहना है कि बाढ़ से आई लकड़ियां उनके लिए जलौनी का सहारा बन रही हैं, लेकिन हर सामान को हाथ में लेते समय यह ख्याल भी आता है कि यह किसी उजड़े परिवार की गृहस्थी का हिस्सा रहा होगा।
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नारायणी का पानी अपने साथ केवल बाढ़ का मलबा नहीं, बल्कि नेपाल के उन परिवारों की गृहस्थी की यादें भी लेकर आया है, जिनके लिए अब ये दरवाजे और चौखट शायद उनके पुराने जीवन की आखिरी निशानी हैं। एक ओर घाट पर लोग बाढ़ से बहकर आई लकड़ियों में अपना ईंधन तलाश रहे हैं, दूसरी ओर वही नदी किनारे किसी अनजान परिवार की उजड़ी गृहस्थी की निशानियां छोड़ती जा रही है। नदी बह रही है...लकड़ियां बहकर किनारे आ रही हैं... और हर चौखट जैसे चुपचाप पूछ रही है—जिस घर का दरवाजा था, वह घर अब कहां होगा?
