न खाने का ठिकाना, न रहने को छत: नेपाल में बाढ़ के बाद उजड़े 33 हजार परिवार, अब एक ही मांग पर अड़े
नेपाल में बाढ़ से उजड़े 33 हजार परिवार अब केवल राहत नहीं, बल्कि भोजन, आवास और वस्त्र के अपने मौलिक ...और पढ़ें

नेपाल में त्रिशूली नदी के रौद्ररूप ने लोगों के आशियाने को तहस नहस कर दिया है। न रहने का ठौर है न तो खाने का ठिकाना। बेघर जिंदगी को राहत का ही सहारा। नदी के सिल्ट से पटे राष्ट्रीय राजमार्ग से धादिंग स्थित बांगे की रहने वाली रीता मगर अपने ससुर क्षेत्रबहादुर मगर के साथ राहत सामग्री लेकर जाती हुई फिर से बिखरी जिंदगी को पटरी पर लाने पर जुटी हैं।-अभिनव राजन चतुर्वेदी
HighLights
नेपाल में 33 हजार बाढ़ पीड़ित परिवार प्रभावित।
भोजन, आवास, वस्त्र को मौलिक अधिकार बताया।
अस्थायी बस्तियों और सुरक्षित आवास की तत्काल आवश्यकता।
विश्वदीपक त्रिपाठी, काठमांडू, नेपाल। बाढ़ से उजड़े 33 हजार परिवारों के सामने अब सिर्फ राहत पाने का सवाल नहीं है, उन्हें अपने मौलिक अधिकार के लिए आवाज उठाने की जरूरत भी महसूस होने लगी है। धादिंग जिले के गजुरी गांवपालिका के बांगे की रहने वाली रीता मगर इसी आवाज को नेपाली में बुलंद करती हैं, 'संविधानले गास (खाद्य), बास (आवास) र कपास (पोशाक) हाम्रो मौलिक अधिकार हो, सरकार यसलाई पूरा गर्नुपर्छ।'
26 अगस्त की बाढ़ में रीता का घर तबाह हो गया। बीते छह दिनों से वह पति, दो बच्चों और ससुर छेत्री बहादुर मगर के साथ गजुरी में एक रिश्तेदार के एक घर रह रही हैं। राहत सामग्री के लिए वह ससुर के साथ गजुरी गांवपालिका पहुंचीं। चावल, दाल, तेल और कुछ उपयोगी वस्तुएं तो मिलीं, लेकिन परिवार के सिर पर छत कब होगी, इसका जवाब नहीं मिला।
रीता कहती हैं, 'सरकार से अभी घर नहीं मांग रहे। यदि बांस और एक पन्नी मिल जाती तो हम खुद रहने के लिए ठिकाना बना लेते। बच्चों को खुले आसमान के नीचे नहीं सुलाना पड़ता।'
सरकारी आंकड़ों में त्रिशूली-भोटेकोशी की बाढ़ में 33 हजार घर पूर्ण और आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त हुए हैं। काठमांडू, रसुवा और नुवाकोट में कुछ पीड़ित शरणार्थी शिविरों में हैं, जबकि अधिकांश रिश्तेदारों और सार्वजनिक भवनों में ठिकाना लिए हुए हैं। ऐसे में रीता की आवाज प्रभावित परिवारों की आवाज भोजन और राहत सामग्री से आगे बढ़कर सुरक्षित आवास को अधिकार के रूप में सुनिश्चित करने की है।

नुवाकोट में बेत्रावती के विनोद तमांग बताते हैं, 'पल भर लगा जिंदगी ही नहीं बची। तेज वेग से जब पानी आया तो संभलने का मौका ही नहीं मिला। किसी तरह ऊंचाई पर पहुंचकर जान बचाई, लेकिन आंखों के सामने घर तबाह होता देख दिल कराह उठा।'
रितु डंगोल बताती हैं कि बाढ़ के बाद से उनके दो बच्चे रात में डर से सो नहीं पाते। सुजन रत्न आचार्य कहते हैं, 'सब कुछ बह गया, अब सबसे बड़ी प्राथमिकता सिर छिपाने की है। कहां रहें, कहां जाएं, कुछ समझ नहीं आ रहा।'
आपदा के शुरुआती 72 घंटे में भोजन और दवा जरूरी होते हैं, लेकिन इसके बाद विस्थापित परिवारों के लिए सुरक्षित ठिकाना सबसे बड़ी जरूरत बन जाता है। सरकार का ध्यान अभी खोज और पहचान पर है, वहीं 33 हजार प्रभावित घरों के परिवारों के लिए अस्थायी बस्तियों और सुरक्षित आवास की व्यवस्था भी जरूरी है। रीता की आवाज इसी जरूरत को मौलिक अधिकार से जोड़ रही है।
यह भी पढ़ें- नेपाल बाढ़ में आंखों के सामने बह गया स्कूल, लेकिन 700 बच्चों का 'देवदूत' बन गया यह हेडमास्टर
शाम ढलते ही गजुरी के शिविर में रीता बच्चों के साथ फिर रिश्तेदार के दरवाजे पर सिमट जाती हैं। उनके सामने सवाल सिर्फ आज की रात गुजारने का नहीं, बल्कि उस अधिकार का है जिसे वह संविधान में दर्ज बताती हैं।
