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नेपाल त्रासदी: हर बेनाम शव के सामने सहमते कदम, कहीं ये चेहरा 'अपने' का तो नहीं?

By Rajnish TripathiEdited By: Vivek Shukla
Published: Sun, 30 Aug 2026 03:43 PM (IST)Updated: Sun, 30 Aug 2026 03:52 PM (IST)

नेपाल में बाढ़ और भूस्खलन के बाद मिले शवों की पहचान के लिए परिजन अस्पतालों में अपनों को तलाश रहे ...और पढ़ें

नेपाल के भैरहवा स्थित भीम अस्पताल। जागरण

नेपाल के भैरहवा स्थित भीम अस्पताल। जागरण

HighLights

  1. परिजनों द्वारा अस्पतालों में अपनों के शवों की तलाश जारी।

  2. डीएनए सैंपलिंग और टैगिंग से शवों की पहचान प्रक्रिया।

  3. त्वरित दफन पर सवाल, सुरक्षित भंडारण की मांग तेज।

रजनीश त्रिपाठी, बुटवल। हम लुंबिनी प्रादेशिक अस्पताल में हैं। भीतर शव रखे हैं। बाहर अपनों की तलाश में पहुंचे लोग खड़े हैं। किसी की आंखों में उम्मीद है कि शायद आज अपने बिछड़े व्यक्ति का अंतिम दर्शन हो जाए। लेकिन इसी उम्मीद के साथ दिल में एक डर भी है, जिस शव को देखने जा रहे हैं, कहीं वह उनका अपना न हो। एक-एक शव का चेहरा देखते हुए कदम आगे बढ़ते हैं और हर बार उम्मीद टूटने के साथ आशंका और गहरी होती जाती है। शवों के बीच अपनों की पहचान का यह सिलसिला लोगों की रूह कंपा दे रहा है।

बाढ़ और भूस्खलन की तबाही के बाद मिले शवों को काठमांडू, भैरहवा, बुटवल, चितवन समेत अलग-अलग जिलों के सरकारी अस्पतालों में फ्रीजर में रखा गया है। भैरहवा में भीम अस्पताल पहुंचने वाले लोग पहले अपने लापता स्वजन की तस्वीर दिखा रहे हैं। इसके बाद उन्हें शव दिखाया जा रहा है।

सामने पड़े शव को देखते ही चेहरे पर एक ही सवाल उभरता है, क्या यही वह चेहरा है, जिसका परिवार कई दिनों से इंतजार कर रहा है? एक शव की पहचान नहीं होती तो राहत की सांस जरूर मिलती है, लेकिन अगले शव के सामने खड़े होने का डर और बढ़ जाता है।

उम्मीद और भय के इसी बीच लोग शवों की कतार में अपनों का चेहरा तलाश रहे हैं। किसी को अंतिम दर्शन की आस है तो किसी को इस बात का डर सता रहा है कि तलाश कहीं उस सबसे भयावह सच पर जाकर खत्म न हो जाए, जिसे स्वीकार करने की हिम्मत परिवार जुटा नहीं पा रहा।

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चितवन के प्रमुख जिला अधिकारी गणेश अर्याल बताते हैं कि हर शव की डीएनए सैंपलिंग कराई गई है। शव पर नंबर डालकर टैग लगाया गया है, ताकि पहचान की प्रक्रिया में कोई भ्रम न हो। पहचान के लिए आने वाले व्यक्ति की ओर से फोटो उपलब्ध कराने के बाद उसका डीएनए सैंपल लिया जा रहा है। डीएनए मिलान होने पर संबंधित परिवार चाहे तो शव ले जाकर अंतिम संस्कार कर सकता है।

रुपंदेही जिले के डीएसपी कृष्ण कुमार चंद बताते हैं कि अब तक यहां 43 शव लाए गए हैं। बस एक की पहचान हो पाई है। 10 तो इस अवस्था में हैं, जिसमें पहचान करना भी चुनौती है। 32 शवों को अलग अलग जगहों पर रखा गया है। पोस्टमार्टम में सभी की डीएनए सैंपलिंग कराकर उसकी टैगिंग के बाद दफनाया जाएगा।

इस बीच शवों को रखने की व्यवस्था को लेकर लोगों का आक्रोश भी सामने आ रहा है। भैरहवा के अजय कसौधन कहते हैं नेपाल में पहली बार परिजनों का पहचानने का हक छीन कर जितने शव मिले हैं सब को दफन कर दिया जा रहा है। काठमांडू के ज्ञानेंद्र खरका कहते हैं कि हमास जैसा मानवता विरोधी संगठन भी शव को 100 दिन से ज्यादा सुरक्षित रख सकता है तो हमारा राज्य संयंत्र अपने ही नागरिकों का अधिकार क्यों छीन रहा है। राज्य को अपने हर नागरिकों को पहचानना चाहिए। अपनी जिम्मेदारी से वह भाग नहीं सकते।

सवाल उठ रहा है कि शवों की संख्या लगातार बढ़ रही है तो उन्हें सुरक्षित रखने के इंतजाम भी बढ़ाए जाने चाहिए। शवों को दफन करने की इतनी जल्दी क्यों है? लोगों की मांग है कि जब तक पहचान की पूरी संभावना है, तब तक शवों को सुरक्षित रखने के लिए अतिरिक्त व्यवस्था की जाए।

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जो शव खराब होने लगे हैं, उन्हें चितवन के धार्मिक अंत्येष्टि स्थल देवघाट में डेढ़ मीटर गहरे गड्ढे में, एक-दूसरे से 50 सेंटीमीटर की दूरी बनाकर दफन किया जा रहा है। हर शव की डीएनए सैंपलिंग और नंबरिंग किए जाने से भविष्य में पहचान की संभावना सुरक्षित रखने का प्रयास किया जा रहा है, लेकिन अपनों की तलाश में पहुंचे लोगों के लिए यह प्रक्रिया भी उस दर्द को कम नहीं कर पा रही, जिसमें हर अगला शव पिछले से बड़ा डर लेकर सामने आता है।

 

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