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    गुरु पूर्णिमा पर संत प्रेमानंद ने दी सीख, मनुष्य जीवन का लक्ष्य ही भगवत प्राप्ति; दर्शन को आई इस राज्य की बारी

    By Vipin Parashar Edited By: Prateek Gupta
    Updated: Tue, 28 Jul 2026 09:03 PM (IST)

    संत प्रेमानंद ने गुरु पूर्णिमा पर कहा कि मनुष्य जीवन का परम लक्ष्य भगवत प्राप्ति है, जिसके लिए प्रिया प्रियतम के चरणों में समर्पण और सद्गुरु की शरण आव ...और पढ़ें

    गुरु पूर्णिमा के अवसर पर चुनिंदा अनुयायियों को दर्शन देते संत प्रेमानंद।

    गुरु पूर्णिमा के अवसर पर चुनिंदा अनुयायियों को दर्शन देते संत प्रेमानंद।

    संवाद सहयोगी, वृंदावन। संत प्रेमानंद ने कहा मनुष्य जीवन का लक्ष्य भगवत प्राप्ति ही है। हमें संपूर्ण रूप से प्रिया प्रियतम के चरणों में समर्पित होते हुए सारे कार्य करना, शास्त्र विरुद्ध कोई आचारण नहीं करना, ये हमारे मनुष्य जीवन का परम लक्ष्य है। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए बहुत साधनों का वर्णन है।

    सांख्य योग, अष्टांग योग, कर्मयोग, भक्तियोग, प्रेम योग इन कठिन साधनों द्वारा प्रेमयोग की प्राप्ति नहीं होती। चूंकि प्रेम दृवित हृदय में होता है, कठोर, मलिन, कपटी हृदय में नहीं। हम मलिन हृदय के कपटिजन हैं, मुखा में कुछ और, हृदय में कुछ और आचरण में कुछ और, हमें हृदय निर्मल करना है तो सबसे पहले सद्गुरुदेव की शरण लेना होगा।

    यमुना पार स्थित यमुना विहार कुंज आश्रम में मंगलवार को संत प्रेमानंद ने कहा हम सद्गुरुदेव की शरण लेकर भगवान की भक्ति करेंगे तो हमारा हृदय निर्मल हो जाएगा और प्रेम प्रकट हो जाएगा। कहा भक्ति नौ प्रकार की होती है पहली श्रवणम् हमारे कान हमेशा भगवत चर्चा सुनें कि हमें कुछ और सुनने की इच्छा ही नहीं रहे। हमें प्रिया प्रियतम की बात सुनने की ही इच्छा हो, तभी प्रेम उजागर होता है

    दूसरा कीर्तन, हमारी जुबान हमेशा भगवान के नाम का कीर्तन करती रहे, जो भगवान के नाम का कीर्तन आधा घंटा भी करते हैं तो उनके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। तीसरा स्मरण, ये बहुत बड़ी भक्ति है और समस्त भक्ति का फल है। हमारी स्मृति में केवल ईष्ट का चिंतन होना ही स्मरण में शामिल है। चौथा पाद सेवनम, जिस घर में ठाकुरजी नहीं होते वह घर शैतान का घर होता है।

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    चूंकि ठाकुरजी तो कण कण में हैं, लेकिन प्रकट में ठाकुरजी होने चाहिए। हर घर में ठाकुरजी की सेवापूजा होनी चाहिए। अर्चनम् इसमें हमें अच्छे अच्छे पदार्थों से ठाकुरजी की सेवा करना, सुंदर पकवान बनाकर ठाकुरजी को अर्पित करें, सुंदर फल अर्पित करें। बंधनम् हमें ठाकुरजी की वंदना करना चाहिए, प्रणाम करना चाहिए, साष्टांग दंडवत करना चाहिए। वंदनम्, दास्यम होना चाहिए।

    हमें ठाकुरजी की वंदना करनी चाहिए, ठाकुरजी को हृदय में रखना चाहिए। दास्यम् हमें सोचना चाहिए भगवान मेरे दोस्त हैं, मेरे मित्र हैं, ये भावना आएगी। आत्म समर्पणम हमें अपने सर्वस्व को भगवान को समर्पित कर देना चाहिए, अपने अहंकार का समर्पण ही आत्मसमर्पण होता है। आत्मसमर्पण भक्ति से ही प्रेम प्रकट हो जता है। वृंदावन प्रिया प्रियतम की लक्षणा भक्ति का केंद्र है

    जो प्रिया प्रियतम के दासत्व में रहता है, उसका ही जीवन श्रेष्ठ है। मंगलवार को गुरुपूर्णिमा महोत्सव में बंगाल, उत्तराखंड, तमिलनाडु, गोवा के साथ स्थानीय दीक्षित शिष्यों ने संत प्रेमानंद के दर्शन कर पूजन किया।