'Border-2' का जादू: फिर बजीं 1997 के दौर वाली तालियां, मेरठ के दर्शकों ने महसूस किया वही पुराना जोश
मेरठ में वसंत पंचमी पर भारी बारिश के बावजूद 'बॉर्डर-2' फिल्म के शो हाउसफुल रहे। दर्शकों ने फिल्म के डायलॉग्स और भावुक पलों का खूब आनंद लिया। सनी देओल, ...और पढ़ें

फिल्म बॉर्डर 2 का पोस्टर। फोटो क्रेडिट- इंस्टाग्राम
HighLights
दर्शकों ने फिल्म को किया पसंद।
1997 की 'बॉर्डर' की याद दिलाई।
प्रदीप द्विवेदी, मेरठ। वसंत पंचमी के दिन मेरठ में सिर्फ बारिश नहीं हो रही थी, यहां सिनेमा हालों में यादें बरस रही थीं। बारिश के कारण ट्रैफिक धीमा हुआ, फिर भी लोग समय से पहले पहुंचना चाहते थे ताकि बार्डर-2 फिल्म का शो छूट न जाए।
दर्शकों का जोश और फिल्म के डायलॉग
ठंड में दर्शकों के जोश ने गर्मी घोली। बारिश की फुहारों के बीच दर्शक मुस्कुराते हुए तेज कदमों से हाल की तरफ बढ़ते चले गए। सिनेमा हालों में हर शो लगभग हाउसफुल रहा। हाल के बाहर खड़े कुछ युवाओं ने मोबाइल पर 1997 की बार्डर के डायलाग चला रखे थे ये धरती मेरी मां है। यही पंक्तियां वर्तमान पीढ़ी को फिर से जोड़ रही हैं उस फिल्म से, जिसने एक दौर में पूरे देश को रुलाया था।
न सरहद रहेगी न तुम.....फैसला ईस्ट में न वेस्ट में फैसला दिल में होगा...ऐसे डायलाग सुनकर दर्शक मुस्कराते हुए फिल्म से जुड़ते हैं। ठंड के मौसम में ठंडी सांस लेते हैं, सनी देओल (फतेह सिंह कलेर) उम्मीद के अनुसार बांधे रखने का आश्वासन देते हैं।
इसी बीच दिलजीत दोसांझ (निर्मल जीत सिंह सेखों) वायुसेना की तरफ से पर्दे पर सामने आते हैं और इसी के साथ शुरू हो जाता है हंसी-ठिठोली का सिलसिला।
अहान शेट्टी (एमएस रावत) नेवी आफिसर के हाथ में मां दुर्गा का एक चित्र दिखाई देता है,जिसे वह हमेशा अपनी जेब में रखते हैं। इसे देखकर दर्शक आपस में कहते हैं...''लगता है बेटी ने बनाकर दिया होगा''। दर्शकों का यह जुड़ाव सच निकलता है, युद्ध वाले अगले फ्रेम में दिखाया गया कि वह चित्र बेटी ने ही बनाकर दिया था। पाकिस्तान के विरुद्ध धधकती आग के बीच धार्मिक सद्भाव, भारतीय सहिष्णुता और सभी को अपनाने का भारतीय स्वभाव दिखाई दिया।
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1965 युद्ध की यादें और भावुक पल
सैनिकों के विवाह के बाद फिर लौटना शुरू होता है 1997 वाला भावुक दौर। ये जाते हुए लम्हों... गाना बजता है और पहले की तरह फिर से आंखों को नम कर दिया। कहानी 1965 के युद्ध की याद दिलाते हुए पहली फिल्म की ओर ले जाती है। ....जितने तुम्हारे यहां लोग नहीं, उतने हमारे यहां बकरे काटे जाते हैं....। सीटी बज उठी।
1997 वाली सीटी और वही तालियां फिर हाल में 29 साल बाद ताल मिलाने लगीं। लगातार भावुक पलों से हाल में सन्नाटा छाया रहा। बैकग्राउंड में संदेशे आते हैं का ट्यून बजता रहा। संदेशे आते हैं...गाना बजा। पहले दिलजीत ने गाया फिर सोनू निगम की पुरानी आवाज को उसी में मिश्रित हुईं, जिससे पुरानी यादें ताजा होने लगीं।
मिलेनियल ने उस समय को देखा, जेन-जी भी जानें वह दौर
60 वर्षीय कर्मवीर और 41 वर्षीय अमर ने कहा कि यह फिल्म कई पीढ़ियाें को आपस में जोड़ने और समझने के लिए भी अच्छी है। मिलेनियल ने देखा है कि कैसे उस समय चिट्ठी भेजी जाती थी। फौजी एक- दूसरे के परिवार से जुड़ते थे।दूसरे के परिवार को अपना मानते थे। कैसे गांव की संस्कृति थी, विवाह का स्वरूप कैसा था, यह जेन-जी यानी नई पीढ़ी को समझनी चाहिए। कर्मवीर कहते हैं कि पहली बार्डर मेरठ में देखी थी। आज बरसात में भी वही पुराना जोश महसूस किया।
इन्होंने कहा
वाकई इस फिल्म ने फिर से पहली फिल्म बार्डर की याद दिला दी। मुझे ही नहीं सभी को अंत तक बांधे रखा। बरसात में आकर फिल्म देखना सफल रहा।
-बादल चौधरी,दर्शक।
फिल्म में सब कुछ है। जैसी उम्मीद थी वैसी ही फिल्म निकली। मजा आया, मेरे लिए अच्छी बात यह थी कि मैंने पहली फिल्म देख रखी है।
-विकास मणि त्रिपाठी, दर्शक।
मैंने पहली फिल्म नहीं देखी है लेकिन उसके बारे में काफी सुना था। गाने सुने थे। पापा व अन्य कुछ लोगों ने प्रशंसा की थी, यह फिल्म उसी तरह से शानदार मिली।
मयंक अरोड़ा, दर्शक।