बाबू के सोना के जो कहीं प्यार में पड़े, ड्रम में मिलोगे या कहीं खाई में मिलोगे... शायर सुल्तान ने दी ये नसीहत
मेरठ में केके बेदिल की याद में आयोजित कवि सम्मेलन और मुशायरा में साहित्यकारों ने अपनी रचनाओं से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया। ...और पढ़ें

कवि सम्मेलन एवं मुशायरा में मंचासीन साहित्यकार। जागरण
HighLights
केके बेदिल की याद में कवि सम्मेलन का आयोजन।
विजेंद्र सिंह परवाज और पापुलर मेरठी को अवार्ड।
कवियों ने सामाजिक चिंतन-हास्य से मंत्रमुग्ध किया।
जागरण संवाददाता, मेरठ। हिंदी, उर्दू के मशहूर लेखक केके बेदिल की याद में आयोजित कवि सम्मेलन एवं मुशायरा में साहित्यकारों ने अपनी रचनाओं से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। रचनाओं में सामाजिक चिंतन दिखा, तो हास्य रस की बौछार भी हुई।
शनिवार की शाम हम ख्याल फाउंडेशन के तत्वावधान में रिठानी स्थित होटल केसरिया स्वीट्स एंड रेस्टोरेंट में आयोजित कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्वलित कर किया गया। अध्यक्षता मेरठ कालेज के पूर्व अध्यक्ष प्रोफेसर युनुस गाजी ने की। इस दौरान विजेंद्र सिंह परवाज और डा. पापुलर मेरठी को केके बेदिल अवार्ड दिया गया। केके बेदिल के पुत्र दीप रस्तोगी और पुत्रवधू स्वीटी रस्तोगी ने उनकी गजल पढ़ी सरस्वती वंदना कोमल रस्तोगी ने की। इसके बाद कविता और शायरी का दौर आरंभ हुआ।
कवि पंकज गाजियाबादी ने पढ़ा, सितम जो मेरे दिल पे ढाए हुए हैं, वो फिर आज महफिल में आए हुए हैं। हमें उनकी यादों से फुरसत नहीं है, जो मुद्दत से हमको भुलाए हुए हैं।
शायर इरशाद बेताब ने अपनी रचना सुनाई, अच्छा होना दिल का कोई अच्छा होना है, जिसमें जितना जर्फ उसे उतना ही रोना है।
कवि सुमनेश सुमन ने पढ़ा, मेरा अरमान रह जाए, वतन की शान रह जाए। तिरंगे का निशा थोड़ा मुझे भी तो मयस्सर हो, मेरे होंठों पे जिंदाबाद हिन्दुस्तान रह जाए।
फुरकान सरधनवी ने पढ़ा, और आलम तो कभी और समा रहता है, एक ही तौर पे कब रंग-ए-जहां रहता है।
संचालन कर रहे सुल्तान सिंह सुल्तान ने अपनी रचना सुनाई, छुपकर किसी से जो न पुरवाई में मिलोगे, खुशहाल सदा घर में अंगनाई में मिलोगे। बाबू के, सोना के जो कहीं प्यार में पड़े, ड्रम में मिलोगे या कहीं खाई में मिलोगे।
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कविता कुसुमाकर ने अपनी रचना पढ़ी, हम शांति के दीप जलाएंगे हमेशा, और फूल मोहब्बत के खिलाएंगे हमेशा, चमकेंगे जमाने में सितारों की तरह, हम संसार में उजाले लुटाएंगे हमेशा। पापुलर मेरठी ने सुनाया, गुस्से में आके मैंने कहा अपनी सास से, कुछ देर मेरी बीवी का पीछा भी छोड़ दे। बेटी के साथ मां मुझे तस्लीम है मगर, लेकिन कभी कभी इसे तन्हा भी छोड़ दे।
कवि एवं शायर विजेन्द्र सिंह परवाज ने पढ़ा कि रुक-रुक के बारिशों का वो मंजर नजर में है, तेरी गली नजर में तेरा घर नजर में है, जिसकी झलक से दिल के अंधेरे चमक उठे, परवाज ऐसा नूर का पैकर नजर में है। तुषा शर्मा ने भी अपनी रचना सुनाई। इस दौरान आदिल चौधरी, सुधाकर आशावादी, सुनीता सैनी, जीशान कुरैशी, श्याम मोहन गुप्ता, अमित दीक्षित और रचना वानिया उपस्थित रहे।