चिकित्सा शिक्षा विभाग की चिंता! इंटरनेट एडिक्शन के शिकार मिले एमबीबीएस के छात्र... मोबाइल स्क्रीन पर व्यस्त पाए गए
मेरठ के लाला लाजपत राय मेडिकल कॉलेज के एक अध्ययन में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। 68% एमबीबीएस छात्र शैक्षणिक कार्य के बाद मोबाइल स्क्रीन पर व्यस्त रहन ...और पढ़ें

(प्रतीकात्मक फोटो)
HighLights
68% एमबीबीएस छात्र इंटरनेट एडिक्शन से ग्रस्त मिले।
छात्रों में छात्राओं की तुलना में अधिक लत मिली।
समूह काउंसिलिंग, खेलकूद से लत छुड़ाने का सुझाव।
जागरण संवाददाता, मेरठ। जिन हाथों में कल देश के स्वास्थ्य की कमान होनी है, वे आज खुद डिजिटल बीमारी का शिकार हो रहे हैं। लाला लाजपत राय मेडिकल कालेज के एक अध्ययन ने चिकित्सा शिक्षा विभाग की चिंता बढ़ा दी है। अध्ययन में मेडिकल कालेज के 68 प्रतिशत एमबीबीएस छात्र शैक्षणिक कार्य के बाद मोबाइल स्क्रीन पर व्यस्त रहने के चलते इंटरनेट एडिक्शन (लत) में पाए गए हैं।
मानसिक रोग विभाग की ओर से मेडिकल कालेज के सभी विभागों को एमबीबीएस छात्रों की इंटरनेट की लत छुड़ाने के लिए समूह काउंसिलिंग, समूह खेलकूद व सांस्कृतिक प्रतियोगिताएं कराने और सामाजिक भागीदारी बढ़ाने का सुझाव दिया गया है।
लाला लाजपत राय मेडिकल कालेज के मानसिक रोग विशेषज्ञ डा. तरुण पाल के निर्देशन में हुए अध्ययन में 500 में से 354 छात्र-छात्राओं को शामिल किया गया था। अध्ययन के परिणाम चौंकाने वाले रहे। 243 छात्र-छात्राएं इंटरनेट की लत में पायी गई। कुल 175 छात्रों में 135 और 179 छात्राओं में 108 छात्राओं को इंटरनेट की लत लगी है। छात्राओं की तुलना में छात्रों यह समस्या अधिक मिली है। डिजिटल फार्मेट पर 31.63 प्रतिशत कुछ समय के लिए,33.05 प्रतिशत में मध्यम,3.96 प्रतिशत छात्र सामान्य से अधिक इंटरनेट का उपयोग कर रहे हैं।
यह अध्ययन स्नातक पाठ्यक्रम के प्रथम वर्ष से लेकर अंतिम वर्ष तक के छात्र-छात्राओं को शामिल किया। जिनसे प्रश्नों के माध्यम से जानकारी जुटाई गई। सबसे ज्यादा सोशल साइट्स पर छात्र-छात्राएं समय बिताते हैं। मोबाइल पर मूवी देखने,गेम खेलने,आनलाइन शापिंग और एकेडमिक पढ़ाई सहित अन्य कार्य भी आनलाइन कर रहे हैं। अध्ययन कराने वाले मानसिक रोग विशेषज्ञ ने कहा कि यह गंभीर स्थिति है कि मेडिकल छात्र अपनी पढ़ाई के तनाव को कम करने के लिए इंटरनेट का सहारा ले रहे हैं, जो उन्हें एक नई बीमारी की ओर धकेल रहा है। इससे उनको निकालने के लिए सभी विभागों की ओर से सामूहिक प्रयास शुरू किए गए हैं।
अध्ययन में छात्रा निधि अगत्स्य का सहयोग रहा। इसे इंडियन जर्नल आफ बिहेवियरल साइंसेज में प्रकाशित किया गया है। यह इंडियन साइक्रेटि्रक सोसायटी सेंट्रल जोनल शाखा का जर्नल है।
इन बिंदुओं पर किया गया अध्ययन
एमबीबीएस छात्र-छात्राएं शैक्षणिक कार्य करने के बाद अपना समय इंटरनेट मीडिया पर किस उद्देश्य के लिए उपयोग कर रहे हैं। छात्र और छात्राओं में कौन सबसे ज्यादा उपयोग कर रहा है। किस शैक्षणिक सत्र के छात्र-छात्राओं द्वारा इसका इस्तेमाल किया जा रहा है। ऐसे करीब 20 बिंदुओं पर अध्ययन किया गया है।
खबरें और भी
पाया गया कि इंटरनेट मीडिया (वाट्सएप सहित अन्य सोशल साइट) पर सबसे अधिक 80 प्रतिशत छात्र-छात्राएं,एकेडमिक के लिए 39 प्रतिशत, गेम खेलने के लिए 17 प्रतिशत, मूवी देखने के लिए 20 प्रतिशत, संगीत सहित अन्य मनोरंजन कार्यक्रम देखने के लिए 18 प्रतिशत छात्र-छात्राएं स्क्रीन पर समय बिता रहे हैं। शैक्षणिक सत्रों मे कोई अंतर नहीं मिला। लगभग सभी छात्रों की एक जैसी ही स्थिति मिली। छात्राओं की तुलना में छात्र ज्यादा इंटरनेट मीडिया का उपयोग कर रहे हैं। 108 छात्राएं और 135 छात्र पाए गए।
इसलिए बढ़ा स्क्रीन टाइम
मानसिक रोग विशेषज्ञ ने अपने अध्ययन में इंटरनेट मीडिया पर अधिक समय बिताने के चलते स्क्रीन टाइम बढ़ने के कारण भी जानें। पाया गया कि मेडिकल की पढ़ाई के लिए छात्र-छात्राएं घर-परिवार से दूर रहते हैं। शैक्षणिक दबाब रहता है। जिसके तनाव से बचने के लिए मनोरंजन के लिए इंटरनेट मीडिया का सहारा लेते हैं। अकेलापन दूर करने के लिए स्क्रीन पर मूवी देखते हैं। गेम खेलते हैं।
स्क्रीन टाइम अधिक होने का ये पड़ेगा दुष्प्रभाव
-नींद की कमी और अकेलेपन की प्रवृत्ति बढ़ सकती है।
- लगातार स्क्रीन पर रहने से अवसाद और चिड़चिड़ापन बढ़ सकता है।
-स्क्रीन टाइम अधिक होने पर शारीरिक गतिविधि कम हो जाएगा।
-शारीरिक गतिविधि कम होने से मोटापा और दिल की बीमारियों का खतरा बढ सकता है।
-लंबे समय तक गेम और इंटरनेट मीडिया से पढ़ाई पर नकारात्मक असर पड़ सकता है।
-खाली समय में स्क्रीन पर व्यस्त रहने से रिश्ते भी प्रभावित होंगे। क्योंकि अपनों से संवाद कम होगा।
मेडिकल कालेज ने बचाव के लिए उठाए ये कदम
-किताबों से जुड़ाव बढ़ाने के लिए छात्र-छात्राओं के समूह बनाए जा रहे हैं और किसी विषय पर सामूहिक चर्चा कराई जा रही है।
-विशेषज्ञों के द्वारा छात्र-छात्राओं को तनाव प्रबंधन के लिए काउंसलिंग दी जा रही है।
-अकेलापन दूर करने के लिए समूह में टास्क दिया जा रहा है ताकि एक-दूसरे के साथ समय बिताएं।
-आउटडोर गेम जैसे क्रिकेट, बैडमिंटन व अन्य खेलकूद प्रतियोगिताएं व सुबह खेलने के लिए प्रेरित किया जा रहा है।
-स्वास्थ्य शिविरों सहित अन्य सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी बढ़ाई जा रही है।
स्क्रीन टाइम कम करने के लिए ये करें
-व्यस्क छात्र-छात्राओं को दो घंटे से ज्यादा स्क्रीन टाइम नहीं बिताना चाहिए।
-मोबाइल से ऐसे एप हटा दें जिनका उनके प्रोफेशन से कोई वास्ता न हो।
-जिन एप का इस्तेमाल कर रहे हैं, उनकी टाइम लिमिट निर्धारित करें।
-शौचालय, बाथरूम, खाने के वक्त, बिस्तर पर ऐसी जगह मोबाइल का इस्तेमाल न करें।
-सोने के दो घंटे पहले और नींद से उठने के दो घंटे बाद तक मोबाइल का उपयोग न करें।
-अनावश्यक आने वाले नोटिफिकेशन को न देखें। प्रतिदिन देखें कि कितना समय स्क्रीन पर कम किया।
-सुबह जागने के बाद खेल के मैदान, जिम, टहलने के लिए निकलें।
-वाट्स एप पर मैसेज भेजने के बजाए काल करें। क्योंकि मैसेज लिखने में लंबा स्क्रीन टाइम साझा होता है।
-डा. तरुण पाल, मानसिक रोग विशेषज्ञ, एलएलआरएम।