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    फर्जी वसीयत और 'मुर्दों' के नाम पर खेल: मायानगर सोसाइटी घोटाले की जांच शुरू, रसूखदारों में मचा हड़कंप

    Updated: Sat, 03 Jan 2026 04:44 PM (IST)

    मुरादाबाद के मायानगर घोटाले में सुशील मल्होत्रा और एसपी शर्मा जैसे मूल सदस्यों के प्लॉट फर्जी वसीयत व गिफ्ट डीड के जरिए बेचे गए। जांच में 10 करोड़ की ...और पढ़ें

    मायानगर सहकारी आवास समिति

    मायानगर सहकारी आवास समिति

    HighLights

    1. कानूनी शिकंजे से बचने के रास्ते तलाशने में जुटीं शहर की हस्तियां

    2. फर्जी वसीयत के आधार पर दूसरे लोगों को बेच दिए गए फ्लैट

    जागरण संवाददाता, मुरादाबाद। मायानगर सहकारी आवास समिति में वर्षों से चल रहे फर्जीवाड़े और भूमि घोटाले की परतें अब एक-एक कर खुलने लगी हैं। जांच की आहट लगते ही हेराफेरी कर फ्लैट और भूखंड हासिल करने वाली शहर की चर्चित हस्तियां कानून के शिकंजे से बचने के लिए रास्ते तलाशने में जुट गई हैं।

    फ्लैटों की फेहरिस्त की जांच में बड़े लोग बेनकाब होंगे। जांच औपचारिक रूप से शुरू होने से पहले ही कई प्रभावशाली चेहरे अपने-अपने राजनीतिक और प्रशासनिक आकाओं के दरबार में हाजिरी लगाने लगे हैं, ताकि कार्रवाई की धार कुंद कराई जा सके, लेकिन कार्रवाई से बचना मुश्किल है।

    इस पूरे मामले के केंद्र में पूर्व विधायक और लंबे समय तक समिति के सभापति रहे फूलकुंवर तथा पूर्व सचिव अजय कुमार दुबे हैं। दोनों ही कांग्रेस से जुड़े रहे हैं और संगठन व सत्ता की राजनीति में इनकी गहरी पैठ बताई जाती है। जिला प्रशासन ने समिति के भंग होने के बाद समिति के दफ्तर को सील कर दिया।

    सील खुलने के बाद ही अब अरबों के इस घपले की जांच तेजी पकड़ेगी। माया नगर सहकारी आवास समिति की जांच में सबसे गंभीर आरोप यह है कि समिति जिम्मेदारों ने जानबूझकर मूल आवंटियों और सदस्यों के अभिलेखों का मिलान नहीं कराया। कूटरचित दस्तावेजों के जरिए गैर-सदस्यों से मिलीभगत कर भूखंडों पर कब्जे कराए गए। यह सब कुछ प्रबंध समिति की जानकारी और संरक्षण में हुआ।

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    उप्र सहकारी समिति अधिनियम-1965 की धारा 31(2) का खुला उल्लंघन किया गया, वहीं धारा 70 और नियमावली-1968 के नियम 225 व 226 के तहत विवाद की स्थिति में मध्यस्थवाद दाखिल करने का अधिकार होते हुए भी एक भी मामला जानबूझकर दर्ज नहीं कराया गया। आरोप है कि यह चूक नहीं, बल्कि व्यक्तिगत लालच और साजिश का हिस्सा थी।

    नगर मजिस्ट्रेट व समिति के प्रशासक विनय पांडेय का कहना है कि इसी महीने सचिव व सहायक सचिव की नियुक्ति होगी। इसके बाद समिति की दफ्तर को खोलने के बाद जांच आगे बढ़ेगी। इसके बाद ही पता लग सकेगा कि बुद्धि विहार स्थित विनायक अपार्टमेंट में फ्लैट किस तरह किसे मिला है। नियम विरुद्ध फ्लैट लेने वाले सभी दोषियों के खिलाफ कार्रवाई होगी।

    तीन भूखंड, एक पैटर्न, एक साजिश

    जांच के दस्तावेज बताते हैं कि किस तरह एक ही पैटर्न पर मूल सदस्यों के भूखंडों को फर्जी वसीयत और गिफ्ट डीड के जरिए हड़प लिया गया। सुशील कुमार मल्होत्रा के 175 वर्गमीटर भूखंड पर फर्जी वसीयत दिखाकर जसवंती और उसके बेटों के नाम गिफ्ट डीड कराई गई। एसपी. शर्मा के नाम 1988 में रजिस्टर्ड भूखंड को 2024 में फर्जी वसीयत के आधार पर दूसरे लोगों को बेच दिया गया।

    उमाशंकर के भूखंड के साथ भी यही खेल खेला गया और 36 साल पुराने बिक्री विलेख को दरकिनार कर नया ट्रांसफर करा दिया गया। हर मामले में आरोप यही है कि जिम्मेदारों ने अपने करीबी प्रॉपर्टी डीलरों के जरिए अप्रत्यक्ष रूप से कब्जा दिलाने में भूमिका निभाई। हैरानी की बात यह है कि इतने महत्वपूर्ण दस्तावेज गायब होने पर कोई एफआइआर, कोई विभागीय कार्रवाई, कोई पत्राचार तक नहीं किया गया।

    इससे यह आशंका और गहरी हो जाती है कि ले-आउट प्लान को जानबूझकर गायब किया गया, ताकि अवैध कब्जों और फर्जी रजिस्ट्रियों का रास्ता साफ रहे।

    10 करोड़ की चपत और फर्जी महावीर

    शिखा बसु बनाम मायानगर गृह निर्माण समिति के मामले में गलत हलफनामा देकर समिति की संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने का आरोप भी रिकार्ड पर है। सबसे बड़ा खुलासा मूल सदस्य चन्दू के भूखंड को लेकर हुआ है, जिसकी रजिस्ट्री 1965 की थी। आरोप है कि फर्जी व्यक्ति ‘महावीर’ को खड़ा कर, मिलते-जुलते नाम के सहारे गाटा संख्या 2132 और 1022 का ट्रांसफर करा दिया गया।

    इससे समिति को करीब 10 करोड़ रुपये की आर्थिक क्षति पहुंची। गाटा संख्या 2132 की भूमि का एग्रीमेंट भी कथित तौर पर जिम्मेदारों ने अपने करीबी के पक्ष में करा दिया। लगभग 30 वर्षों तक एक ही पद पर बने रहना सहकारी समिति कानून और निर्वाचन नियमावली-2014 की भावना के खिलाफ है।

    आरोप है कि दो जिम्मेदारों ने बिना आवास आयुक्त व अपर निबंधक की अनुमति के जमीनों का विनिमय किया गया। बदले में गांगन नदी किनारे जलमग्न और अनुपयोगी भूमि ले ली गई, जबकि मूल बहुमूल्य जमीनें व्यवसायिक प्रतिष्ठानों को सौंप दी गईं।

     

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