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     ₹20 से लेकर ₹25 हजार तक... जब सरकारी तंत्र हारा तो ग्रामीणों की 'कारसेवा' ने बहल्ला नदी पर खड़ा किया पुल

    Updated: Sun, 26 Jul 2026 06:00 AM (IST)

    सरकारी तंत्र की विफलता के बाद ग्रामीणों ने बहल्ला नदी पर चंदे से पुल का निर्माण किया। यह पुल ₹20 से लेकर ₹25 हजार तक के योगदान से 'कारसेवा' के तहत खड़ ...और पढ़ें

    मुरादाबाद के अफजलपुर भायपुर और रामपुर के बैंजनी गांव के बीच बहल्ला नदी पर बने पुल के पिलर

    मुरादाबाद के अफजलपुर भायपुर और रामपुर के बैंजनी गांव के बीच बहल्ला नदी पर बने पुल के पिलर

    HighLights

    1. नेता न बना सके पुल, ग्रामीणों ने कारसेवा से नौ पिलर बनवाए

    मोहसिन पाशा, मुरादाबाद। विकास के बड़े-बड़े दावों के बीच चंदा इकट्ठा करके कारसेवा से बहल्ला नदी पर बन रहा अधूरा पड़ा पुल सरकारी व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है। मुरादाबाद और रामपुर जिले की सीमा पर अफजलपुर भायपुर और बैजनी गांव के बीच बह रही इस नदी पर पिछले 30 वर्षों से पुल की मांग होती रही, लेकिन कई सरकारों और जनप्रतिनिधियों की ओर से कोई ठोस पहल नहीं की।

    आखिरकार ग्रामीणों ने हार मानने के बजाए खुद चंदा जुटाकर पुल बनाना शुरू कर दिया। अब धनराशि खत्म होने के कारण निर्माण कार्य एक जून 2026 से बंद पड़ा है।

    इस पुल के बनने से मुरादाबाद और रामपुर के करीब 40 से अधिक गांवों की तस्वीर बदल सकती है। अफजलपुर भायपुर से रामपुर के तोपखाना तक की दूरी महज छह किलोमीटर रह जाएगी, जबकि फिलहाल मूंढापांडे होकर करीब 20 किलोमीटर का लंबा रास्ता तय करना पड़ता है।

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    इससे समय और ईंधन दोनों की बचत होगी और दो जिलों के बीच आवागमन का नया मार्ग भी मिलेगा। 17 जनवरी 2024 को ग्रामीणों की बैठक में निर्णय लिया गया कि अब नेताओं और सरकारी फाइलों का इंतजार नहीं किया जाएगा। समाजसेवी राशिद अली की अगुवाई में ग्रामीणों ने चंदा अभियान शुरू किया।

    डेरा कार सेवा ट्रस्ट का गठन कर बैंक खाता खोला गया। गांव-गांव जाकर लोगों ने अपनी हैसियत के अनुसार सहयोग दिया। 1678 लोगों ने करीब 12.25 लाख रुपये का योगदान दिया, जिसके बाद दो जून 2024 से पुल निर्माण शुरू हुआ। नहर विभाग के एक इंजीनियर की मदद से डिजाइन तैयार कराया गया।

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    ग्रामीणों की मेहनत से पुल के नौ पिलर तैयार हो गए, लेकिन अब धन खत्म हो चुका है। करीब साढ़े पांच मीटर चौड़े इस पुल का निर्माण पिछले लगभग दो महीने से ठप पड़ा है। अधूरे पिलर आज भी नदी के बीच खड़े होकर सरकारी उदासीनता की गवाही दे रहे हैं। बरसात के दिनों में बहल्ला नदी उफान पर होती है तो दोनों जिलों के गांवों का संपर्क लगभग टूट जाता है।

    स्कूली बच्चों को लंबा रास्ता तय करना पड़ता है, जबकि मरीजों को अस्पताल पहुंचाने में घंटों लग जाते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि पूर्व सांसद स्वर्गीय डाॅ. शफीकुर्रहमान बर्क, पूर्व विधायक स्वर्गीय रिजवानुल हक सहित कई जनप्रतिनिधियों से वर्षों तक पुल की मांग की गई, लेकिन हर बार सिर्फ आश्वासन मिला।

    अब सवाल यह है कि जब सीमित संसाधनों वाले ग्रामीण 12 लाख रुपये जुटाकर नौ पिलर खड़े कर सकते हैं, तो करोड़ों रुपये के विकास बजट वाली सरकारी व्यवस्था आखिर एक पुल क्यों नहीं बना सकी? बहल्ला नदी पर अधूरा पुल केवल ईंट, सीमेंट और सरियों का ढांचा नहीं, बल्कि उन विकास दावों का आईना है जो जमीनी हकीकत से आज भी काफी दूर दिखाई देते हैं।

    20 रुपये से लेकर 25 हजार तक... हर हाथ ने जोड़ी पुल की ईंट

    बहल्ला नदी पर पुल बनाने के लिए जुटाया गया चंदा ग्रामीण एकजुटता की मिसाल बन गया। ट्रस्ट को सबसे बड़ा सहयोग नया गांव के हाजी सिब्ते ने 25 हजार रुपये देकर किया, जबकि अफजलपुर भायपुर के डाॅ. नबी अहमद ने अपने परिवार की ओर से 10-10 हजार रुपये की तीन रसीदें कटवाईं।

    मूंढापांडे के ब्लाॅक प्रमुख डाॅ. नवदीप यादव और रामपुर के जिला पंचायत सदस्य मुस्तुफा हुसैन ने भी पुल में सहयोग किया। ट्रस्ट अध्यक्ष के अनुसार, कई ग्रामीण ऐसे भी रहे जिन्होंने अपनी आर्थिक स्थिति के बावजूद सिर्फ 20 रुपये का योगदान दिया।

    हर दानदाता को रसीद जारी की गई। पुल का अनुमानित बजट 25 लाख रुपये रखा है, जिसमें से अब तक 12,13,313 रुपये नौ पिलरों के निर्माण पर खर्च हो चुके हैं। ट्रस्ट के अध्यक्ष राशिद हुसैन, सचिव मोहम्मद हनीफ और कोषाध्यक्ष जाहिद हुसैन हैं।

     

    बहल्ला नदी पर कारसेवा से बन रहे पुल का शनिवार को निरीक्षण किया है। गांव के लोगों से भी बात हुई है। जानकारी यह मिली है कि लोगों ने आपसी सहयोग से पुल के पिलर बनाए हैं। पूरे मामले से आला अधिकारियों को अवगत करा दिया जाएगा।

    - अभय सिंह, एसडीएम सदर, मुरादाबाद


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