VIDEO: यूपी के इस गांव में घर-घर मोरों का बसेरा, यहां हैरान करने वाला है इंसानों से इनका 'दोस्ताना'
Muzaffarnagar News : मुजफ्फरनगर के रसूलपुर जाटान गांव में मोर घरों में परिवार के सदस्य की तरह रहते हैं। ग्रामीण उनका पूरा ध्यान रखते हैं। उनके साथ खेल ...और पढ़ें
HighLights
मोर घरों में आते हैं, रसोई तक पहुंच जाते हैं।
मोर बच्चों संग खेलते हैं, ग्रामीण देते हैं दाना-पानी।
आशु सिंह, मुजफ्फरनगर। आमतौर पर अगर आपको मोर देखने हैं तो जंगल या फिर चिड़ियाघर में यह सुख प्राप्त हो सकता है। किस्से, कहानियों, कविताओं और गीतों में जो वर्णन किया गया है उससे इस पक्षी के प्रति सहज ही एक आकर्षण पैदा होता है।
रूप-रंग के धनी मोर को पूरे पंख फैलाकर नाचते देखना भी एक विशेष क्षण है। आइए आज आपको बताते हैं उस गांव की कहानी जहां मोर कोई दुर्लभ पंछी नहीं, बल्कि घर के सदस्य की तरह है। या यूं कहें कि यह गांव मयूरों का अपना घर है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।
बात हो रही है शाहपुर क्षेत्र के रसूलपुर जाटान गांव की है। मुख्यालय से करीब 25 किलोमीटर दूर इस गांव के रहवासियों के लिए मोर उनके पारिवारिक सदस्य की तरह हो गए हैं। मोर ग्रामवासियों से इतने सहज हो गए हैं कि आंगन में अपना बसेरा बना लिया है।
रसोई में चले जाते हैं और जब तक गृहिणी उन्हें कुछ खाने के लिए नहीं दे देती तब तक उसके पीछे-पीछे घूमते रहते हैं। बच्चे इनसे डरते नहीं, बल्कि इनके साथ खेलते हैं। इनको आम पक्षियों की तरह दाना-पानी देते हैं।
रसूलपुर जाटान गांव में घुसते ही मोर की कर्कश आवाज आपका ध्यान खींचती है। किसी भी घर या घेर में आप जाएंगे तो एक-एक पेड़ पर चार-पांच मोर-मोरनी आपको डेरा डाले दिखेंगे। ग्रामीण सुरेश कुमार बताते हैं कि उनकी उम्र 65 वर्ष है और वे बचपन से मोरों को अपने घर-आंगन में देख रहे हैं।
मोर से ग्रामीणों का कितना लगाव है इसको एक घटना से समझा जा सकता है। सुरेश ने बताया कि चार वर्ष पूर्व उनके पिताजी करता राम का निधन हो गया। पिताजी उनके घर में आने वाले चार मोरों को रोज रोटी खिलाते थे। पिता के निधन के बाद चारों मोर बहुत दुखी नजर आने लगे थे। चारों मोर उनकी तेरहवीं तक निरंतर उनके घर में रहे। कहीं और नहीं गए। एक तरह से मोरों ने शोक मनाया था।
नरेश पाल बताते हैं कि मोर रात को भी यहीं रहते हैं पेड़ों पर। कोई एकाध घर नहीं बल्कि कई घरों में इनका बसेरा है। सभी घरों में इनके लिए पात्र रखे हुए हैं जिनमें इनको दाना-पानी दिया जाता है।
पवन कुमार कहते हैं कि करीब 20 वर्षों से मोरों का गांव में दिखना अधिक हो गया। इनकी संख्या दर्जनों में है। ये घर की रसोई तक चले जाते हैं। उनके घर में दो मोर स्थायी रूप से रहते हैं। वे कहीं नहीं जाते। रात में पेड़ों की ऊंची डाल पर बैठ जाते हैं।
यह भी विशेषता है कि ये किसी अंजान व्यक्ति के पास नहीं जाते और न ही उसके हाथ से कुछ खाते हैं।
गांव में ही पूर्व कैबिनेट मंत्री सुधीर बालियान के घर में भी आधा दर्जन मोर दिखाई पड़ते हैं। उनके पड़ोस में रहने वाली शर्मिष्ठा आर्य ने बताया कि जब तक वे रसोई में खाना बनाती हैं तब तक मोर वहीं रहते हैं। जब से वे गांव में ब्याहकर आईं तब से यहां मोरों को इसी तरह देख रही हैं। ये अंजान लोगों को देखकर डर जाते हैं।
आठवीं में पढ़ने वाले शिवाय मोरों के लिए हाथ में रोटी के छोटे-छोटे टुकड़े करते हुए बोले कि इनको देखना और खाना खिलाना बहुत अच्छा लगता है।
घायल होने पर कराते हैं उपचार
अगर कोई मोर तकलीफ में हो या कोई जानवर उसे घायल कर दे तो ग्रामीण दुखी हो जाते हैं। वे मोर का यथासंभव उपचार कराते हैं। अभी चार दिन पहले ही एक मोर पर कुत्तों के झुंड ने हमला कर दिया।
गांव के प्रदीप बालियान की नजर पड़ी तो उन्होंने कुत्तों के झुंड से मोर को बचाया। मोर के घाव साफ करके उस पर मरहम लगाया और उसका प्राथमिक उपचार किया।
गांव के प्रदीप बालियान की नजर पड़ी तो उन्होंने कुत्तों के झुंड से मोर को बचाया। मोर के घाव साफ करके उस पर मरहम लगाया और उसका प्राथमिक उपचार किया।
इसकी सूचना वन विभाग को दी। ग्रामीण बताते हैं कि किसी मोर का निधन होने पर उसका अंतिम संस्कार भी सम्मान के साथ करते हैं। उसे जंगल में दफनाते हैं।
वन विभाग के प्रभागीय निदेशक अभिनव राज का कहना है कि पिछली गणना (2024-25) के अनुसार जनपद में मोरों की संख्या 1700 है। यह संरक्षित श्रेणी में है। इसके चोटिल होने की सूचना पर वन विभाग तुरंत उपचार कराता है।
आमतौर पर कोई भी पक्षी किसी इंसान के पास नहीं जाता क्योंकि वह बहुत कमजोर होता है। लेकिन अगर उन्हें विश्वास हो जाए कि कोई उन्हें नुकसान नहीं पहुंचाएगा और उन्हें छुएगा नहीं तो इंसान के प्रति उनका व्यवहार बदल भी सकता है। रसूलपुर जाटान गांव में भी मोरों के व्यवहार में परिवर्तन का यह एक कारण हो सकता है।