महंगाई ने फीका किया जेवर के घेवर का स्वाद, गैस और दूध के बढ़े दामों का असर
जेवर के प्रसिद्ध घेवर का जायका इस बार महंगाई से प्रभावित है, दूध की कमी और महंगे गैस सिलेंडर के कारण इसकी कीमतें 100-250 रुपये तक बढ़ गई हैं। त्योहारो ...और पढ़ें

जेवर में हलवाई की दुकान पर लकड़ी की भट्टी पर तैयार होता समान। जागरण
HighLights
जेवर के घेवर की कीमतें 100-250 रुपये बढ़ीं।
दूध की कमी और महंगे गैस सिलेंडर मुख्य कारण।
हलवाई गैस छोड़ लकड़ी की भट्टियां अपना रहे हैं।
मनोज कुमार शर्मा, जेवर (ग्रेटर नोएडा)। पारंपरिक स्वाद,खास बनावट और शुद्धता के लिए प्रसिद्ध जेवर के घेवर का जायके पर इस बार महंगाई का असर दिख रहा है। वर्षा के मौसम खासकर सावन के महीने में हरियाली तीज से लेकर रक्षाबंधन तक इसकी अत्यधिक मांग रहती है।
जेवर का घेवर दिल्ली एनसीआर के अलावा दूर-दूर तक रिस्तेदारियों में भेजा जाता है लोग इसे बढे स्वाद के साथ खाते भी है लेकिन दूध की किल्लत और महंंगे गैस सिलेंडर की वजह से घेवर के रेट आसमान छू रहे हैं। पिछले वर्ष की तुलना में घेवर 100 से 250 रुपये तक महंगा बिक रहा है। उसके बावजूद भी दुकानदार घेवर की बिक्री को घाटे का सौदा मान रहे हैं।
वर्षा का मौसम शुरू होते ही जेवर कस्बे की प्रत्येक मिठाई की दुकान पर घेवर की मिठाई का निर्माण और बिक्री शुरू हो जाती है। लेकिन होर्मुज संकट के चलते पहले से महंगे कमर्शियल गैस सिलेंडर और क्षेत्र में कृषि क्षेत्र कम होने का असर दुग्ध उत्पादन कम होने से दूध की किल्लत शुरू हो गई है।
सैकड़ों वर्षों से जेवर की प्रसिद्ध मिठाई के रूप में बनाए जाने वाले बढ़िया घेवर की कीमत जो बीते वर्ष 300 से 350 रुपये किलोे थी उसी घेवर की कीमत इस बार 500 से ऊपर चल रही हैं। मिठाई विक्रेताओं ने बताया कि पिछले वर्ष की तुलना में गैस और दूध, घी के अलावा कारीगरों के भी पैसे बढ़ने की वजह से घेवर महंगा हो रहा है।
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घेवर के बिना अधूरा माना जाता है तीज और राखी के त्योहार
जेवर के मशहूर इस व्यंजन के बिना क्षेत्र में तीज और रक्षाबंधन का त्योहार अधूरा माना जाता है। भाईयों को राखी बांधने के लिए आने वाली महिलाएं इन त्योहारों पर इस मिठाई को अपने मायके लेकर आती हैं।
साथ ही नवविवाहित वधु के घर पर वर पक्ष से सावन के महीने में सिंजारा के रूप में घेवर की मिठाई लेकर जाई जाती है। जेवर के आसपास हरियाणा, राजस्थान और ब्रज क्षेत्र के बड़े हिस्से में इसे सावन की प्रमुख पारंपरिक मिठाई माना जाता है।
हलवाईयों गैस सिलेंडर छोड़ लकड़ी की भट्टियों पर बना रहे मिठाई
होर्मुज स्ट्रेट ठप होने के बाद कमर्शियल गैस सिलेंडरों की कीमतें आसमान छू रही हैं जिसकी वजह से हलवाईयों ने मिठाईयों को गैस भट्टी पर बनाने के बजाय लकड़ी की भट्टी को बढ़ावा देना शुरू कर दिया है।
लकड़ी की खास तरीके की बनी इन भट्टियों में तेज और धीमा करने के लिए पंखा लगाया गया है। गैस सिलेंडर की अपेक्षा इस भट्टी का प्रयोग काफी सस्ता पड़ रहा है।
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