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    नोएडा हिंसा: फैक्ट्रियों को घुटनों पर लाकर मनमानी कराना चाहते थे उपद्रवी, 1500 पेज की चार्जशीट में बड़ा खुलासा

    Updated: Sat, 20 Jun 2026 09:07 PM (IST)

    नोएडा में रिचा ग्लोबल फैक्ट्री में हुई हिंसा वेतन वृद्धि का आंदोलन नहीं, बल्कि औद्योगिक इकाइयों को अपने नियंत्रण में लेने की एक सुनियोजित साजिश थी। पु ...और पढ़ें

    13 अप्रैल को हुई हिंसा की फोटो।

    13 अप्रैल को हुई हिंसा की फोटो।

    HighLights

    1. हिंसा वेतन वृद्धि नहीं, औद्योगिक नियंत्रण की सुनियोजित साजिश थी।

    2. 1500 पेज की चार्जशीट में फंडिंग, भड़काऊ प्रचार का खुलासा।

    3. उपद्रवी औद्योगिक इकाइयों को घुटनों पर लाकर मनमानी कराना चाहते थे।

    धर्मेंद्र चंदेल, नोएडा। नोएडा में 13 अप्रैल की सुबह सेक्टर 63 में सायरन की आवाज से ज्यादा तेज एक साजिश का पर्दा फटा था। रिचा ग्लोबल की फैक्ट्री के गेट पर जो हंगामा हुआ, वह सिर्फ वेतन बढ़ोत्तरी का महज आंदोलन नहीं था, बल्कि सालभर से बुनी जा रही एक स्क्रिप्ट का क्लाइमैक्स था।

    औद्योगिक इकाईयों में श्रमिक आंदोलन के बहाने उपद्रवी यहां की इकाईयों में अपना वर्चस्व कायम करना चाहते थे, ताकि इंडस्ट्री को घुटनों पर लाकर भविष्य में अपने इशारों पर मनमाफिक कार्य करा सकें। यह खुलासा फेज दो कोतवाली पुलिस द्वारा श्रमिक हिंसा में रिचा ग्लोबल द्वारा दर्ज कराए गए मामले की विवेचना में हुआ है। गिरफ्तार आरोपितों के खिलाफ कई अहम साक्ष्य मिलने का दावा भी पुलिस ने विवेचना में किया है।

    दाखिल हो चुकी है 1500 पेज की चार्जशीट 

    अदालत में करीब 1500 पेज की चार्जशीट दाखिल हो चुकी है। इसमें सरकार के विरोध में हिंसा की प्लानिंग, फंडिंग और भड़काऊ सामग्री के प्रचार-प्रचार की अलग-अलग जिम्मेदारी आरोपितों के पास होने की बात कही गई है। कई चौकाने वाले बात सामने आई है। नोएडा उपद्रव के बाद कहा गया था कि कुछ दिन पहले हरियाणा के मानेसर में हुए श्रमिक आंदोलन की वजह से यहां हिंसा भड़की थी। वहां के श्रमिक यहां के कामगारों के संपर्क में थे।

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    उन्होंने अपना वेतन बढ़ने की बात कही थी, जिससे यहां भी मांग जोर पकड़ गई। पुलिस जांच में यह बात गलत पाई गई है। मानेसर के आंदोलन से यहां कोई लेना-देना नहीं था। पुलिस विवेचना में साफ हुआ है कि मानेसर के आंदोलन को हथियार बनाकर आरोपितों ने यहां उपद्रव कर देश की औद्योगिक छवि को खराब करने की साजिश रची।

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    साजिश का ही नतीजा था कि 13 अप्रैल की सुबह नोएडा में अचानक हजारों लोग सड़क पर एकत्र हो गए और फैक्ट्रियों में तोड़फोड़ की।

    पुलिस विवेचना में आया है कि रुपेश राय और आदित्य आनंद हर रविवार को श्रमिक बस्तियों में जाते थे। हाथ में पर्चे, जुबान पर हक और जागरूकता शब्द रहता था। मानेसर की घटना के बाद उनका एजेंडा सेट हो गया था। वह कहते थे कि देखो मानेसर में श्रमिकों ने कैसे मैनेजमेंट को झुकाया है। नोएडा में क्यों नहीं हो सकता?

    पर्दे के पीछे सृष्टि, मनीषा और आकृति का नेटवर्क काम कर रहा था। वाट्सएप ग्रुप बने, मजदूर एकता नोएडा, वेतन क्रांति 2026 व सुबह का गुड मार्निंग मैसेज शाम तक कल फैक्ट्री बंद की काल में बदल जाता था। मुद्दा वेतन बढ़ोत्तरी का बनाया गया, पर मकसद सिर्फ औद्योगिक इकाइयों को घुटनों पर लाकर मनमाफिक कार्य कराना था।

    दूसरा एजेंडा, फंडिंग और फायर

    1500 पेज की चार्जशीट अब बताती है कि कोर ग्रुप में रोल बंटे थे। कोई फंड जुटाता, कोई लीगल कवर देता, कोई इंटरनेट मीडिया पर माहौल बनाता। प्लान सिंपल था। पहले छोटे विरोध, फिर उत्पादन ठप और पूरे शहर की इंडस्ट्री को लाक कर देना। पुलिस सूत्रों ने बताया कि इसके पीछे सोच यह थी कि जब उत्पाद के आर्डर कैंसिल होंगे, एक्सपोर्ट रुकेंगे, तब प्रबंधन खुद घुटनों पर आएगा। फिर उनकी शर्तों पर फैक्ट्री चलेगी।

    घटना वाले दिन भीड़ जागरूकता के नाम पर आई थी। पर नारों के साथ पत्थर भी आए। मशीनें बंद कराई गईं, सुपरवाइजरों को घेरा गया। पुलिस पहुंची तो पता चला कि भीड़ में आधे लोग तो रिचा ग्लोबल के थे ही नहीं। वह बड़े शहरों में पहुंचने की साजिश के तहत बाहर से बुलाए गए चेहरे थे।

    पर्दा गिरा, पर सवाल बाकी

    10 लोग गिरफ्तार हुए। वाट्सएप चैट, बैंक ट्रांजैक्शन, मीटिंग की डिटेल, सब फाइल में है। पर सबसे बड़ा सवाल यह है कि मजदूर के हक की लड़ाई और इंडस्ट्री को बंधक बनाने की साजिश के बीच की लाइन कब मिट गई? जानकारों का कहना है कि जागरूकता जरूरी है।

    वेतन पर बात भी होनी चाहिए, लेकिन जब जागरूकता का बोर्ड लगाकर पूरी इंडस्ट्री को घुटनों पर लाने का ब्लूप्रिंट बनता है, तब वह हक की लड़ाई नहीं रह जाती। वह फिरौती बन जाती है।

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