कमजोर की सजा सिर्फ मौत! पीलीभीत टाइगर रिजर्व में बाघों का ऐसा खौफ कि घर छोड़ने को मजबूर हुए तेंदुए
पीलीभीत टाइगर रिजर्व में बाघों की बढ़ती संख्या के कारण तेंदुए जंगल छोड़कर बाहर आ रहे हैं। इससे मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ रहा है और तेंदुओं द्वारा इंसानो ...और पढ़ें

पीलीभीत टाइगर रिजर्व में घूमता बाघ और तेंदुआ। फाइल फोटो
HighLights
जंगल से बाहर आने पर तेंदुओं के बढ़ रहे हमले
मानव वन्यजीव संघर्ष की आशंका भी बढ़ रही
जागरण संवाददाता, पीलीभीत। जंगल में बिग कैट के रहने का तरीका यही है, जो ताकतवर होगा, वही राज करेगा। कमजोर को जंगल छोड़कर दूसरे ठिकाने तलाशना होगा। उसकी उपस्थिति विद्रोह मानी जाएगी, जिसकी सजा सिर्फ मौत होती है। जंगल के इस नियम से शेर, बाघ, तेंदुआ और चीता सभी पूरी तरह से भिज्ञ होते हैं। यही वजह है कि पीलीभीत टाइगर रिजर्व के जंगल में बाघों की संख्या बढ़ने के साथ ही वहां से तेंदुओं ने बाहर निकलकर शिकार करना शुरू कर दिया, जो मानव वन्यजीव संघर्ष को बढ़ावा देने वाला है।
पीलीभीत टाइगर रिजर्व का जंगल 730 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है। इसमें 71 बाघ वर्ष 2022 की बाघ गणना के अनुसार हैं, जो अब बढ़कर 80 के पार पहुंचने की उम्मीद है। ऐसे में जंगल का इलाका उनके लिए छोटा होने लगा है। इसके अलावा करीब 50 तेंदुआ भी जंगल के अंदर है, जबकि काफी तेंदुए टाइगर रिजर्व के बाहर भी हैं।
पिछले पांच दिनों में तीन जगह तेंदुओं ने जंगल के बाहर निकलकर लोगों पर हमला किया। एक स्थान पर तेंदुआ को पकड़ने का प्रयास किया गया, जिसमें पांच लोग घायल हो गए। वहीं, एक तेंदुआ पकड़ भी लिया गया, जिसकी स्वास्थ्य जांच करने के बाद बाहर भेज दिया गया।
तेंदुआ के बारे में पीटीआर के डीएफओ मनीष सिंह बताते हैं कि बिग कैट प्रजाति में तेंदुआ बाघ और शेर की तुलना में छोटा होता है, जो अक्सर शेर और बाघ दोनों के पास रहता है। अपनी मौका परस्त आदत की वजह से तेंदुआ हर जगह खुद को सुरक्षित रख लेता है, लेकिन बाघों और शेरों की संख्या बढ़ने पर उनकी टेरेटरी छोटी होने लगती है।
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इससे तेंदुआ को शिकार करने और खुद को सुरक्षित रखने में दिक्कत होती है। तेंदुआ चिड़िया से लेकर इंसानों तक को मारकर खा सकता है। उन्होंने बताया कि टाइगर का रेंज छोटा होता है, जबकि तेंदुआ का बड़ा होता है। तेंदुआ के लिए गन्ने की फसल सबसे मुफीद होती है। वह गन्ने में छिपकर छोटे जानवरों का शिकार कर लेता और सुरक्षित भी रहता है।
सामाजिक वानिकी के डीएफओ भरत कुमार डीके बताते हैं कि जंगल में बाघों की संख्या अधिक होने पर तेंदुए बाहर की ओर आते हैं। गन्ने के खेतों में आसानी से छिप जाता है और शिकार कर लेता है। लेपर्ड की संख्या भी बढ़ रही है। तेंदुआ की साइटिंग जंगल में कम होती है, जबकि बाघ अक्सर दिख जाते हैं। अपनी टेरेटरी में तेंदुआ को देखकर बाघ उनको मार डालता है। यही वजह है कि तेंदुए जंगल छोड़ देते हैं।
आउटसाइड फारेस्ट में ही 80 प्रतिशत तेंदुए रहते हैं, क्योंकि वह खेतों में रहता है। जंगल में होने वाले संघर्ष में तेंदुओं की मृत्यु हो जाती है। अब तक मैंने बाघ के हमले के बाद तेंदुओं की मृत्यु होने पर उनके शव के 15 से 20 पोस्टमार्टम किए हैं। पीलीभीत टाइगर रिजर्व की हरीपुर रेंज में करीब डेढ़ वर्ष पहले दो तेंदुओं के शव के पोस्टमार्टम किए थे। इसके अलावा बहराइच के कतर्नियाघाट और दुधवा टाइगर रिजर्व में भी लेपर्ड का पोस्टमार्टम किए। कतर्नियाघाट में दो तेंदुओं का एक ही दिन पोस्टमार्टम किया, जिनको बाघों ने मार डाला था।
- दक्ष गंगवार, वन्यजीव पशु चिकित्सक
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