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    इलाहाबाद हाई कोर्ट में अधिवक्ता के खिलाफ अवमानना केस, कोर्ट के प्रति असम्मानजनक भाषा इस्तेमाल करने पर कार्रवाई

    By Suresh pandey Edited By: Brijesh Srivastava
    Updated: Sat, 14 Feb 2026 07:49 PM (IST)

    इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक अधिवक्ता के खिलाफ अवमानना का केस शुरू करने की सिफारिश की है। अधिवक्ता पर कोर्ट के प्रति असम्मानजनक भाषा का इस्तेमाल करने का आ ...और पढ़ें

    इलाहाबाद हाई कोर्ट के प्रति असम्मानजनक भाषा इस्तेमाल करने पर अधिवक्ता के खिलाफ अवमानना केस की कार्रवाई की गई।

    इलाहाबाद हाई कोर्ट के प्रति असम्मानजनक भाषा इस्तेमाल करने पर अधिवक्ता के खिलाफ अवमानना केस की कार्रवाई की गई। 

    HighLights

    1. अधिवक्ता ने न्यायमूर्ति पर ‘सरकार के दबाव’ में काम करने का लगाया आरोप

    2. एक जमानत अर्जी पर सुनवाई के दौरान एकल पीठ ने अधिवक्ता पर की कार्रवाई

    विधि संवाददाता, जागरण, प्रयागराज। एक जमानत अर्जी पर सुनवाई के दौरान अधिवक्ता की भाषा, आरोपों को अत्यधिक आपत्तिजनक, अपमानजनक तथा निंदनीय मानते हुए न्यायमूर्ति संतोष राय की एकल पीठ ने आपराधिक अवमानना की कार्यवाही की संस्तुति के साथ मुख्य न्यायमूर्ति को संदर्भित कर दिया है। साथ ही यह भी कहा है कि वह अब यह मामला नहीं सुनेंगे और मुख्य न्यायमूर्ति के आदेश के बाद इसे यथाशीघ्र एक अन्य पीठ के समक्ष प्रस्तुत किया जाए।

    हतया के प्रयास मामले में जमानत अर्जी की सुनवाई

    अलीगढ़ के हरदुआगंज थाने में दर्ज हत्या के प्रयास से जुड़े मामले में आरोपित कुनाल की जमानत अर्जी की सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह तीन सप्ताह के भीतर पूर्ण चिकित्सा साक्ष्य के अलावा घटना में घायल तथा चिकित्सक के बयान के साथ हलफनामा दाखिल करें। अगली सुनवाई 10 मार्च को होगी।

    अधिवक्ता ने किन शब्दों का किया प्रयोग?

    कोर्ट के अनुसार आदेश के तुरंत बाद अधिवक्ता आशुतोष कुमार मिश्रा ने कहा, ‘आप (न्यायमूर्ति) काउंटर हलफनामा क्यों मांग रहे हैं? आपके पास विवेचना अधिकारी से स्पष्टीकरण मांगने का साहस नहीं है, जिसने आज तक घायल का बयान नहीं लिया है। आपके पास जांच अधिकारी के खिलाफ आदेश पारित करने का साहस नहीं है। ऐसा प्रतीत होता है कि आप सरकार के दबाव में काम कर रहे हैं।’

    ये शब्द न्यायालय की गरिमा को कम करने वाले

    इससे पहले राज्य सरकार की तरफ से एजीए पुरुषोत्तम मौर्य ने जानकारी दी थी कि 19 जनवरी 2026 को एफआइआर दर्ज की गई है, लेकिन घायल यश जैन का बयान नहीं हो सका है। एफआइआर के अनुसार छाती पर गोली लगी है। बचाव पक्ष के अधिवक्ता के शब्दों ‘साहस नहीं है’ और ‘सरकार के दबाव’ में काम कर रहे हैं’, को न्यायमूर्ति ने अत्यंत आपत्तिजनक अपमानजनक और न्यायालय की गरिमा को कम करने वाला माना।

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    न्यायालय की कार्यवाही करीब 10 मिनट बाधित रही

    कोर्ट के अनुसार अधिवक्ता के शारीरिक आक्रामकता से न्यायालय की कार्यवाही लगभग 10 मिनट बाधित रही। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यह आचरण न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप और उसे बाधित करने का प्रयास है और ‘आपराधिक अवमानना’ की परिभाषा में आता है। इसमें अवमानना की कार्यवाही की आवश्यकता है ताकि न्यायालय की गरिमा और अधिकार की रक्षा की जा सके। कोर्ट ने रजिस्ट्रार से कहा है कि इस मामले को उचित आदेश के लिए मुख्य न्यायमूर्ति के समक्ष प्रस्तुत किया जाए।