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राहुल गांधी को बड़ी राहत, इलाहाबाद HC ने खारिज की FIR वाली याचिका; सिखों पर विवादित टिप्पणी का मामला

By Suresh pandey Edited By: Brijesh Srivastava
Published: Thu, 05 Nov 2026 02:18 PM (IST)Updated: Thu, 05 Nov 2026 06:00 PM (IST)

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने राहुल गांधी के खिलाफ सिखों पर कथित विवादित टिप्पणी मामले में FIR की मांग वाली याचिका खारिज कर दी है।

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने राहुल गांधी के खिलाफ एफआईआर की मांग वाली याचिका खारिज कर दी है। जागरण आर्काइव

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने राहुल गांधी के खिलाफ एफआईआर की मांग वाली याचिका खारिज कर दी है। जागरण आर्काइव

HighLights

  1. अदालत ने कहा- राहुल को समुदायों की चिंता उठाने का अधिकार,:वाराणसी कोर्ट आदेश को चुनौती

  2. सितंबर 2024 में अमेरिका दौरे के दौरान दिए गए राहुल गांधी के बयान से जुड़ा है यह मामला

विधि संवाददाता, जागरण, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि राहुल गांधी निर्वाचित प्रतिनिधि हैं और उन्हें किसी समुदाय की चिंता उठाने का अधिकार है। अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर सवाल उठाना अपने आप में अपराध नहीं है। केवल शक के आधार पर आपराधिक मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।

आदेश 16 अक्टूबर को सुरक्षा रखा गया था 

कोर्ट ने इस आधार पर सिखों के संबंध में दिए गए कथित बयान को लेकर राहुल गांधी के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी है। न्यायमूर्ति विक्रम डी. चौहान की एकलपीठ ने गुरुवार को फैसला सुनाया। आदेश 16 अक्टूबर को सुरक्षित रखा गया था।

वाराणसी में पूर्व प्रधान ने याचिका दायर की थी

वाराणसी के तिलमापुर के पूर्व प्रधान नागेश्वर मिश्र ने याचिका दायर की थी। उनका आरोप था कि राहुल गांधी ने सितंबर 2024 में अमेरिका यात्रा के दौरान वर्जीनिया में कहा था कि भारत में सिखों के बीच असुरक्षा का माहौल है। याची के अनुसार, यह बयान भड़काऊ है और बीएनएस की धारा 152 के तहत अपराध है। प्रतिबंधित संगठन के प्रमुख गुरपतवंत सिंह पन्नू ने बयान का समर्थन किया है, जिससे अलगाववादी गतिविधियों को बल मिलेगा।

सारनाथ थाने में एफआईआर अर्जी से शुरू हुआ मामला

मामला सारनाथ थाने में एफआईआर की अर्जी से शुरू हुआ। मजिस्ट्रेट कोर्ट ने अर्जी खारिज की। रिवीजन के बाद मामला फिर मजिस्ट्रेट के पास भेजा गया, जहां 17 अक्तूबर 2025 को अर्जी दोबारा खारिज हुई। सत्र न्यायालय ने नौ जुलाई 2026 को इस आदेश को सही ठहराया। दोनों आदेशों को हाई कोर्ट में चुनौती दी गई थी।

'बयान से असहमति जीवंत लोकतंत्र का हिस्सा'

हाई कोर्ट ने कहा कि अभिव्यक्ति की आजादी संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत मूल अधिकार है। भाषण पर आपराधिक मुकदमे की मांग पर अदालतों को सावधानी से विचार करना चाहिए और इस आजादी की रक्षा करनी चाहिए। बयान से असहमति जीवंत लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन इससे वह अपराध नहीं बन जाता।

'बयान हिंसा भड़काने, लोक व्यवस्था बिगाड़ने वाला नहीं'

कोर्ट के अनुसार, बयान हिंसा भड़काने या लोक व्यवस्था बिगाड़ने वाला नहीं लगता, बल्कि समाज के एक वर्ग की चिंता जताता है। किसी तीसरे पक्ष द्वारा बयान का गलत इस्तेमाल किए जाने पर जिम्मेदारी उसी की होगी, वक्ता की नहीं। कोर्ट ने कहा कि याची यह नहीं बता पाया कि बयान से अलगाव, सशस्त्र विद्रोह या देश की संप्रभुता-अखंडता को कैसे खतरा पहुंचा? दो साल बाद भी कोई ठोस तथ्य सामने नहीं आया और बयान की तिथि, समय व स्थान भी स्पष्ट नहीं किए गए। शक सबूत की जगह नहीं ले सकता। विदेशी धरती पर दिया गया बयान अनुचित या परंपरा के विपरीत हो सकता है, पर इससे वह अपराध नहीं बनता। जनप्रतिनिधि के बयान का जवाब संसदीय बहस या सार्वजनिक चर्चा से दिया जाना चाहिए।

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