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'किशोरावस्था में दर्ज आपराधिक मामला सरकारी नौकरी में बाधा नहीं बन सकता'; इलाहाबाद HC की महत्वपूर्ण टिप्पणी

Updated: Thu, 20 Aug 2026 11:02 PM (IST)

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया है कि किशोरावस्था में दर्ज आपराधिक मामला सरकारी नौकरी में बाधा नहीं बन सकता।

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HighLights

  1. किशोरावस्था का आपराधिक मामला नौकरी में बाधा नहीं।

  2. सीआरपीएफ आरक्षी की बर्खास्तगी रद्द, मिली राहत।

  3. कोर्ट ने 25% बकाया वेतन देने का आदेश दिया।

विधि संवाददाता,प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सीआरपीएफ के पूर्व आरक्षी की बर्खास्तगी रद करते हुए उसे महत्वपूर्ण राहत प्रदान की है। न्यायमूर्ति अनीश कुमार गुप्ता की एकलपीठ ने यह आदेश देते हुए कहा है कि किशोरावस्था में दर्ज आपराधिक मामला चाहे उसमें दोषसिद्धि ही क्यों न हुई हो, वयस्क होने के बाद सरकारी नौकरी में बाधा नहीं बन सकता।

कोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए यह भी आदेश दिया है कि चूंकि याची करीब 20 वर्षों से नौकरी से बाहर रहा और मामला अदालत में लंबित था, इसलिए उसे 25 प्रतिशत बकाया वेतन दिया जाए। याची चंद्रेश्वर प्रसाद यादव 2003 में सीआरपीएफ में आरक्षी के पद पर भर्ती हुआ था।

प्रशिक्षण के दौरान चरित्र सत्यापन में यह सामने आया कि उसके खिलाफ आजमगढ़ में वर्ष 2001 में आइपीसी की धारा 427, 323, 504 और 506 के तहत आपराधिक केस दर्ज था, जिसका उल्लेख उसने सत्यापन फार्म में नहीं किया था। इसी आधार पर पांच अगस्त, 2004 को उसकी सेवाएं समाप्त कर दी गई थीं।

आदेश के खिलाफ अपील और पुनरीक्षण अर्जी क्रमशः 27 फरवरी और 27 अप्रैल को खारिज हो गई थीं, जिसके बाद उसने हाई कोर्ट का रुख किया। याची के अधिवक्ता श्याम सरन श्रीवास्तव ने अदालत के समक्ष दलील दी कि जब सितंबर 2001 में एफआइआर दर्ज हुई थी, तब याची नाबालिग था।

ऐसे में किशोर न्याय (बालकों की देखभाल एवं संरक्षण) अधिनियम, 2000 की धारा 19 और 21 के तहत किशोरावस्था में दर्ज आपराधिक केस का असर उसकी सरकारी नौकरी पर नहीं पड़ना चाहिए। इसके समर्थन में शिवम मौर्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य सहित कई पूर्व फैसलों का हवाला दिया गया।

केंद्र सरकार के अधिवक्ता रवि प्रकाश सिंह ने तथ्य छिपाने के आधार पर याचिका खारिज करने की मांग की। कोर्ट ने पाया कि याची को 28 फरवरी 2005 को आपराधिक केस में मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा बरी किया जा चुका था और यह तथ्य पुनरीक्षण प्राधिकारी के समक्ष रखा गया था, लेकिन प्राधिकारी ने इस पर विचार नहीं किया।

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के अवतार सिंह बनाम भारत संघ (2016) 8 एससीसी 471 के दिशा-निर्देशों का भी हवाला दिया, जिनमें तथ्य छिपाने के मामलों में नियोक्ता को नियुक्ति रद करने से पहले सभी परिस्थितियों पर विचार करने को कहा गया है।

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