मृतक के नाम पर लर्निंग लाइसेंस जारी होने पर हाई कोर्ट सख्त, केंद्र और राज्य सरकार से मांगा जवाब
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि पुलिस की अंतिम रिपोर्ट के बावजूद मजिस्ट्रेट केस डायरी के आधार पर सीधे संज्ञान ...और पढ़ें

HighLights
पुलिस की अंतिम रिपोर्ट पर भी मजिस्ट्रेट ले सकता है संज्ञान।
सीआरपीसी 200 व 202 की प्रक्रिया अपनाने की बाध्यता नहीं।
हाई कोर्ट ने औरैया न्यायिक मजिस्ट्रेट का आदेश बहाल रखा।
जागरण संवाददाता, लखनऊ। इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने मृत व्यक्ति के नाम पर लर्निंग लाइसेंस जारी होने के मामले को गंभीरता से लेते हुए केंद्र और राज्य सरकार से जवाब मांगा है। कोर्ट ने पूछा कि यदि किसी मृत व्यक्ति के आधार नंबर के आधार पर उसके नाम पर लर्निंग लाइसेंस जारी हुआ है तो ऐसा कैसे संभव हुआ।
सरकारी पक्ष की ओर से यह स्पष्ट नहीं किया जा सका कि ऐसी स्थिति कैसे उत्पन्न हुई। मामले की अगली सुनवाई छह सप्ताह बाद होगी। न्यायमूर्ति राजन राय और न्यायमूर्ति सैयद कमर हसन रिजवी की पीठ ने यह आदेश संतोष मिश्रा की ओर से दाखिल जनहित याचिका पर दिया।
याचिका में आधार विवरण के आधार पर लर्निंग और ड्राइविंग लाइसेंस जारी करने की मौजूदा आनलाइन व्यवस्था को चुनौती दी गई है। साथ ही केंद्रीय मोटर वाहन नियम, 1989 के नियम 11 और आधार प्रमाणीकरण से संबंधित नियमों के तहत जारी अधिसूचनाओं को भी चुनौती दी गई है। नियम-11 को चुनौती दिए जाने के कारण कोर्ट ने अटार्नी जनरल आफ इंडिया को भी नोटिस जारी करने का आदेश दिया है।
याचिका में कहा गया है कि मौजूदा आनलाइन व्यवस्था में लर्निंग लाइसेंस के लिए आधार नंबर उपलब्ध कराने पर उसमें दर्ज विवरण लाइसेंसिंग अथारिटी तक पहुंच जाता है और फिर आगे की प्रक्रिया पूरी होती है। याची का तर्क है कि आधार कार्ड उम्र का वैध प्रमाण नहीं है। ऐसे में केवल आधार पर लाइसेंस जारी करने की व्यवस्था मोटर वाहन अधिनियम के प्रविधानों के विपरीत हो सकती है।
याचिका के साथ ऐसे दस्तावेज भी प्रस्तुत किए गए, जिनके आधार पर दावा किया गया कि एक मृत व्यक्ति के आधार नंबर का इस्तेमाल कर उसके नाम पर लर्निंग लाइसेंस जारी हुआ। एक अन्य मामले में आधार विवरण के साथ अश्लील तस्वीरें आनलाइन अपलोड होने के बावजूद लर्निंग लाइसेंस जारी होने का दावा किया गया।
हालांकि केंद्र और राज्य सरकार की ओर से आरोपों का विरोध किया गया। सरकारी पक्ष ने कहा कि केवल आधार नंबर देने से लर्निंग लाइसेंस स्वत: जारी नहीं होता, बल्कि अन्य निर्धारित औपचारिकताएं भी पूरी करनी होती हैं। इस पर कोर्ट ने मृत व्यक्ति के नाम पर लाइसेंस जारी होने के दावे को लेकर सवाल किया, लेकिन सरकारी पक्ष की ओर से इसका स्पष्ट जवाब नहीं मिल सका।
क्लोजर रिपोर्ट खारिज कर सीधे संज्ञान ले सकता है मजिस्ट्रेट : हाई कोर्ट
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि पुलिस द्वारा अपराध में किसी आरोपित के खिलाफ अंतिम रिपोर्ट दाखिल किए जाने के बावजूद मजिस्ट्रेट केस डायरी की सामग्री के आधार पर सीधे संज्ञान ले सकता है और आरोपितों को तलब कर सकता है। इसके लिए मजिस्ट्रेट पर सीआरपीसी की धारा 200 व 202 के तहत विहित प्रक्रिया अपनाने की बाध्यता नहीं है।
यह टिप्पणी न्यायमूर्ति संदीप जैन की एकलपीठ ने जीतू सोनी की याचिका पर उनके अधिवक्ता बिपिन कुमार पाल व अन्य को सुन कर की है। कोर्ट ने सत्र अदालत का आदेश रद करते हुए न्यायिक मजिस्ट्रेट औरैया द्वारा तलब किए जाने संबंधी आदेश को बहाल रखा है।
18 मार्च 2015 को बिधूना (औरैया) में सराफा दुकान बंद कर लौट रहे अनिल सोनी पर लाल रंग की पल्सर से आए सत्येंद्र उर्फ चुनमुन व नारायण ने जानलेवा हमला कर गोली मार दी थी। पुलिस जांच के दौरान घायल अनिल व वादी जीतू सोनी ने आरोपितों की पहचान की और मेडिकल रिपोर्ट में भी गोली लगने की पुष्टि हुई।
इसके बावजूद जांच अधिकारी ने मामले में फाइनल रिपोर्ट लगा दी। वादी ने इसके खिलाफ प्रोटेस्ट पिटीशन दाखिल की। न्यायिक मजिस्ट्रेट औरैया ने क्लोजर रिपोर्ट खारिज कर सीआरपीसी की धारा 190(1)(बी) के तहत संज्ञान लेते हुए आरोपितों को आइपीसी की धारा 307 में तलब कर लिया।
सत्र न्यायाधीश औरैया ने पुनरीक्षण याचिका स्वीकार करते हुए मजिस्ट्रेट के आदेश को यह कहते हुए रद कर दिया कि मजिस्ट्रेट ने केस डायरी के आधार पर अपराध बनने का स्पष्ट निष्कर्ष दर्ज नहीं किया था।
हाई कोर्ट ने कहा कि पुलिस रिपोर्ट पर मजिस्ट्रेट पुलिस के निष्कर्षों से बंधा नहीं होता। वह सीआरपीसी की धारा 190(1)(बी) के तहत केस डायरी में मौजूद गवाहों के बयानों और मेडिकल साक्ष्यों पर खुद स्वतंत्र रूप से विचार कर आरोपियों को समन जारी कर सकता है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संज्ञान लेने और समन जारी करने के चरण में अदालत को केवल यह देखना होता है कि प्रथमदृष्टया मामला बनता है या नहीं। इस स्तर पर सबूतों के विस्तृत मूल्यांकन या आरोपित के बचाव पर विचार करने की आवश्यकता नहीं होती।
इसके साथ हाई कोर्ट ने सत्र अदालत के आदेश को त्रुटिपूर्ण मानते हुए रद कर दिया और न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा आरोपियों को मुकदमे के लिए तलब करने के आदेश को पूरी तरह सही ठहराया। इस आदेश के बाद आरोपितों के खिलाफ आपराधिक केस चलेगा।
