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    कोविड ड्यूटी में जान गंवाने वाले दारोगा की पत्नी को HC से राहत, अनुग्रह राशि दावे पर पुनर्विचार का आदेश

    Updated: Thu, 23 Jul 2026 10:24 AM (IST)

    इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कोविड ड्यूटी में जान गंवाने वाले उपनिरीक्षक की पत्नी को राहत दी है। कोर्ट ने मुरादाबाद डीएम के अनुग्रह राशि खारिज करने के आदेश क ...और पढ़ें

    इलाहाबाद हाई कोर्ट।

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    विधि संवाददाता, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कोविड-19 ड्यूटी के दौरान संक्रमित होकर जान गंवाने वाले उपनिरीक्षक की पत्नी को बड़ी राहत देते हुए जिलाधिकारी मुरादाबाद के उस आदेश को रद कर दिया है, जिसमें अनुग्रह धनराशि के लिए अर्जी खारिज कर दी गई थी।

    यह आदेश न्यायमूर्ति प्रकाश पाडिया और न्यायमूर्ति विवेक सरन की खंडपीठ ने दिया है।याची ऊषा द्विवेदी के पति योगेंद्र प्रताप द्विवेदी थाना सिविल लाइंस में कोविड हेल्प डेस्क पर तैनात थे।

    ड्यूटी के दौरान वे संक्रमित हो गए और जांच में पाजिटिव पाए जाने पर उन्हें जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां 23 अप्रैल 2021 को उनकी मृत्यु हो गई। पत्नी ने राज्य सरकार के शासनादेश के तहत 50 लाख रुपये अनुग्रह राशि के लिए आवेदन किया, लेकिन जिलाधिकारी ने 11 नवंबर 2021 के आदेश से इसे तकनीकी आधार पर खारिज कर दिया।

    कारण यह बताया कि कोविड प्रबंधन ड्यूटी पर तैनाती संबंधी सक्षम अधिकारी का कोई आदेश पत्रावली पर उपलब्ध नहीं था। इस आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी गई। राज्य के स्थायी अधिवक्ता ने तर्क दिया कि चूंकि मृतक की कोविड ड्यूटी पर तैनाती का कोई दस्तावेज समय दिए जाने के बावजूद प्रस्तुत नहीं किया गया, इसलिए मात्र संक्रमण और मृत्यु के आधार पर अनुग्रह राशि नहीं दी जा सकती।

    कोर्ट ने पाया कि याचिका के साथ वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक द्वारा जारी वह प्रमाणपत्र संलग्न है, जिसमें मृतक की कोविड ड्यूटी पर तैनाती की पुष्टि की गई है। यद्यपि यह पत्र जिलाधिकारी के आदेश के बाद का है फिर भी 11 नवंबर 2021 की तिथि का एक अन्य ड्यूटी प्रमाणपत्र भी शासनादेश के प्रारूप के अनुसार मौजूद है, जिसमें मृतक की कोविड ड्यूटी की अवधि दर्शाई गई है।

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    अदालत ने कहा कि अनुग्रह राशि से संबंधित शासनादेश का उद्देश्य कल्याणकारी प्रकृति का है और चूंकि विभागाध्यक्ष/वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक का प्रमाणपत्र उपलब्ध है, इसलिए याची के दावे पर पुनर्विचार आवश्यक है।

    खंडपीठ ने जिलाधिकारी को निर्देश दिया कि वह वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक कार्यालय से ताजा टिप्पणी/दस्तावेज मंगवाकर आदेश की प्रमाणित प्रति प्राप्त होने की तिथि से तीन माह के भीतर याची के दावे पर पुनः विचार करें। याचिका बिना किसी हर्जाने के आदेश के साथ स्वीकार कर ली गई।

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