हाई कोर्ट ने शस्त्र लाइसेंस जारी करने में देरी और 'गन कल्चर' पर जताई चिंता, सभी जिलों से मांगा हथियारों का ब्यौरा
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश में शस्त्र लाइसेंस जारी करने में अत्यधिक देरी और प्रक्रियागत उलझनों पर गंभीर असंतोष व्यक्त किया है। ...और पढ़ें

शस्त्र लाइसेंस जारी करने में देरी पर हाई कोर्ट नाराज

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विधि संवाददाता, जागरण, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने प्रदेश में शस्त्र लाइसेंस जारी करने की उलझी प्रक्रिया और इसमें होने वाली अत्यधिक देरी पर गहरा असंतोष व्यक्त किया है। न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर की एकलपीठ ने ‘जय शंकर उर्फ बैरिस्टर’ की याचिका की सुनवाई करते हुए राज्य के गृह विभाग और जिला प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं।
न्यायालय ने पाया कि शस्त्र लाइसेंस के आवेदनों को बिना किसी ठोस कारण के वर्षों तक लंबित रखा जा रहा है, जो कि शस्त्र नियमावली 2016 के प्रविधानों का स्पष्ट उल्लंघन है। याची का आवेदन जिलाधिकारी ने लगभग चार साल की देरी के बाद खारिज किया था, जिसे कोर्ट ने अनुचित और अस्पष्ट प्रशासनिक व्यवहार माना है।
प्रकरण में अगली सुनवाई 28 अप्रैल 2026 को निर्धारित की गई है। अदालत ने शस्त्र लाइसेंस के सामाजिक और मनोवैज्ञानिक पहलुओं पर टिप्पणी करते हुए कहा कि ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में हथियार अब आत्मरक्षा के बजाय शक्ति प्रदर्शन और सामाजिक प्रभाव का प्रतीक बन गए हैं।
कोर्ट ने चिंता जताई कि अपराधी छवि वाले लोग और राजनीतिक महत्वाकांक्षा रखने वाले व्यक्ति अपनी दबंग छवि बनाने और दूसरों को डराने के लिए कानूनी हथियारों का दुरुपयोग कर रहे हैं। इंटरनेट (सोशल) मीडिया पर हथियारों के प्रदर्शन और रील्स बनाने की बढ़ती प्रवृत्ति को भी कोर्ट ने समाज के लिए बड़ा खतरा बताया है।
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न्यायालय के अनुसार, यह ‘गन कल्चर’ न केवल कानून के शासन को कमजोर करता है बल्कि आम नागरिक के मन में भय का माहौल भी पैदा करता है। कड़े रुख अपनाते हुए हाई कोर्ट ने अपर मुख्य सचिव (गृह) को विस्तृत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है।
इस हलफनामे में सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि क्या राज्य में शस्त्र लाइसेंस का कोई डेटाबेस तैयार किया गया है और क्या शस्त्र नियमों के तहत अनुमोदित डेटा को डिजिटल रूप से एनडीएएल सिस्टम पर अपडेट किया जा रहा है। साथ ही, अदालत ने उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य के लिए मजबूत शस्त्र नीति की आवश्यकता पर भी सवाल पूछा है।
कोर्ट ने उन प्रशासनिक बाधाओं की जानकारी भी मांगी है, जिनकी वजह से जिलाधिकारी शस्त्र नियमावली के समयबद्ध प्रविधानों का पालन नहीं कर पा रहे हैं। इसके अलावा, न्यायालय ने एक ही परिवार के कई सदस्यों के पास अलग-अलग शस्त्र लाइसेंस होने की प्रथा पर भी न्यायिक जांच के आदेश दिए हैं।
प्रदेश के सभी 75 जिलों के जिलाधिकारियों और पुलिस कप्तानों को निर्देश दिया गया है कि वे जिलावार और थानावार हथियारों का विवरण प्रस्तुत करें। इसमें विशेष रूप से उन लाइसेंस धारकों की सूची मांगी गई है, जिनका आपराधिक इतिहास रहा है या जिनके विरुद्ध दो से अधिक मामले लंबित हैं।