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'हलाला की आड़ में नाबालिग से सामूहिक दुष्कर्म गंभीर अपराध', इलाहाबाद हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी

By Suresh pandey Edited By: Brijesh Srivastava
Published: Fri, 03 Jul 2026 02:37 PM (GMT+05:30)

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अमरोहा में नाबालिग से हलाला की आड़ में दुष्कर्म और सामूहिक बलात्कार के आरोप वाली एफआइआर ...और पढ़ें

इलाहाबाद उच्च न्यायालय की फाइल फोटो।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय की फाइल फोटो।

HighLights

  1. हाई कोर्ट ने कहा 'हलाला की आड़ में नाबालिग से सामूहिक दुष्कर्म और बलात्कार गंभीर अपराध'

  2. खंडपीठ ने तैयब सहित 5 आरोपियों की 4 याचिकाओं को एक साथ सुनकर सभी को खारिज कर दिया

विधि संवाददाता, प्रयागराज। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अमरोहा के थाना सैदनगली में दर्ज एक बहुचर्चित एफआइआर को रद करने से इन्कार कर दिया है, जिसमें निकाह, तलाक व हलाला की आड़ में एक नाबालिग से दुष्कर्म और बाद में सामूहिक बलात्कार के आरोप लगाए गए हैं। न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने तैयब सहित पांच आरोपियों की चार याचिकाओं को एक साथ सुनकर सभी को खारिज कर दिया।

जनवरी 2016 में अजहर ने ट्रिपल तलाक दे दिया

पीड़िता का निकाह 25 अप्रैल 2015 को अजहर नवाज़ नामक व्यक्ति से जबरन कराया गया था, जब उसकी उम्र मात्र 15 वर्ष बताई गई। शादी के बाद पति द्वारा मारपीट का सिलसिला शुरू हुआ और जनवरी 2016 में अजहर ने ट्रिपल तलाक दे दिया। कुछ महीनों बाद अजहर दोबारा शादी का प्रस्ताव लेकर आया, लेकिन इसके लिए नवंबर 2016 में पीड़िता को हलाला निकाह से गुजरना पड़ा, जो मौलाना कय्यूम के साथ बुलंदशहर के सियाना कस्बे में कराया गया। आरोप है कि इस दौरान पीड़िता, जो तब नाबालिग थी, के साथ जबरन शारीरिक संबंध बनाए गए।

एक अन्य महिला नयाब अख्तर से शादी कर ली

अप्रैल 2017 में अजहर के साथ दूसरा निकाह हुआ और 2018 में एक बेटी का जन्म हुआ। लेकिन अजहर का व्यवहार फिर बिगड़ा और जनवरी 2021 में उसने दूसरी बार तीन तलाक दे दिया, इद्दत के दौरान ही एक अन्य महिला नयाब अख्तर से शादी कर ली।

'फर्जी निकाह' का नाटक रचा गया

बाद में बेटी की कस्टडी और भरण-पोषण के बहाने अजहर दोबारा पीड़िता के संपर्क में आया। इस बार पीड़िता को बताया गया कि चूंकि उसे दो बार तलाक हो चुका है, इसलिए दो बार हलाला करना होगा। आरोप है कि 19 फरवरी 2025 को हलाला के नाम पर सह-अभियुक्त शाहनवाज़ चौधरी और हकीम निशात ने पीड़िता के साथ बलात्कार किया, और उसी शाम एक "फर्जी निकाह" का नाटक रचा गया, जिसे बाद में पीड़िता ने धोखा बताया। पीड़िता के बयान दर्ज होने के बाद जांच अधिकारी ने तैयब सहित छह अन्य सह-अभियुक्तों को जोड़ा और भारतीय न्याय संहिता की धाराओं के साथ पाक्सो अधिनियम की धाराएं भी जोड़ी गईं। अब कुल नौ आरोपी हैं।

'दबाव बनाने के इरादे से यह एफआइआर दर्ज कराई गई'

वरिष्ठ अधिवक्ता शशि कांत शुक्ला ने तर्क दिया कि 2016 में ट्रिपल तलाक शरीयत के तहत मान्य था और निकाह हलाला इस्लामी कानून में एक वैध व मान्यता प्राप्त परंपरा है। उन्होंने यह भी कहा कि 2021 के तलाक दस्तावेज़ों में पीड़िता ने अपनी उम्र 24 वर्ष बताई थी, जिससे 2015 में निकाह के समय उसकी उम्र 18 वर्ष निकलती है। यह भी दावा किया गया कि बेटी की कस्टडी विवाद के चलते अजहर द्वारा आई जी आर एस पोर्टल पर शिकायत करने के बाद, दबाव बनाने के इरादे से यह एफआइआर दर्ज कराई गई।

अतिरिक्त शासकीय व पीड़िता के वकीलों ने क्या दी दलील?

अतिरिक्त शासकीय अधिवक्ता शशि शेखर तिवारी और पीड़िता के वकील श्याम कुमार यादव ने दलील दी कि गंभीर अपराध प्रथम दृष्टया स्पष्ट हैं और मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट के आधार पर उम्र की गणना करने पर नवंबर 2016 में पीड़िता नाबालिग (लगभग 16 वर्ष) थी। उन्होंने इंडिपेंडेंट थॉट बनाम भारत संघ (2017) के फैसले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया है कि नाबालिग के साथ कोई भी यौन संबंध, चाहे वैवाहिक हो या पर्सनल लॉ के तहत, बलात्कार माना जाएगा।

अदालत ने महत्वपूर्ण बात कही

अदालत ने कहा कि आपराधिक कानून में पर्सनल लॉ की आड़ लेकर अपराध से बचा नहीं जा सकता। पहले हलाला के समय पीड़िता नाबालिग थी, इसलिए वह प्रथम दृष्टया पाक्सो अधिनियम के तहत अपराध है, जबकि दूसरा हलाला (फरवरी 2025) सामूहिक बलात्कार का मामला प्रतीत होता है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह हलाला प्रथा की संवैधानिकता पर कोई टिप्पणी नहीं कर रही, लेकिन जिन परिस्थितियों का वर्णन एफआईआर में है, वे संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत गरिमा व समानता के मूल्यों के विपरीत हैं।

सभी चारों याचिकाएं खारिज करते हुए अंतरिम आदेश भी समाप्त

पीठ ने यह भी नोट किया कि आरोपियों की अग्रिम जमानत याचिकाएं पहले ही खारिज हो चुकी हैं और पीड़िता ने दबाव व धमकी को लेकर एक और एफआइआर दर्ज कराई है। अदालत ने कहा कि यह मामला विस्तृत जांच की मांग करता है और शुरुआती चरण में एफआइआर रद नहीं की जा सकती। और सभी चारों याचिकाएं खारिज करते हुए अंतरिम आदेश भी समाप्त कर दिए गए।

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