काला हिरण संरक्षित क्षेत्र : योजना ही बनाता रह गया प्रयागराज वन विभाग, बीत गई सर्दी पर नहीं हुई मृगों की गणना
प्रयागराज वन विभाग काला हिरण संरक्षित क्षेत्र में हिरणों की गणना की योजना बनाता रह गया, लेकिन सर्दी बीत गई और गणना नहीं हो पाई। मेजा के चांद खमरिया स् ...और पढ़ें

प्रयागराज के यमुनापार में मेजा के चांद खमरिया स्थित संरक्षित क्षेत्र में कुचाले भरते काले हिरण। सौजन्य : वन विभाग
HighLights
मेजा के चांद खमरिया स्थित कृष्ण मृग संरक्षित क्षेत्र में 3 वर्ष पूर्व हुई थी गणना
विलुप्ति के संकट से घिरे काले हिरणों का कुनबा दिन पर दिन बढ़ रहा है
जागरण संवाददाता, प्रयागराज। कृष्ण मृग (ब्लैकबग) संरक्षित क्षेत्र में काले हिरणों के झुंड साल दर साल वृहद आकार ले रहे हैं। विलुप्ति के संकट से घिरे हिरणों का कुनबा बढ़ना सुखद समाचार है। इनकी संख्या में कितनी बढ़ी, इसकी सटीक जानकारी इन्हें संरक्षित करने वाले विभाग के पास भी नहीं है। हालांकि समय-समय पर विभाग इनकी गणना कराता रहा है। करीब तीन वर्ष बाद इस बार सर्दी के मौसम में इसकी योजना बनी थी, लेकिन वन विभाग सिर्फ तैयारी ही करता रह गया।
वर्ष 2017 में कृष्ण मृग संरक्षित क्षेत्र घोषित
यमुनापार में मेजा के चांद खमरिया में लगभग 126 हेक्टेयर में यह कृष्ण मृग संरक्षित क्षेत्र स्थित है। काले हिरण पहाड़ी इलाकों, पथरीले मैदानों व जंगलों के मिश्रित क्षेत्र में रहना पसंद करते हैं। चांद खमरिया व उसके आसपास का इलाका भी ऐसा ही है, इस नाते सरकार ने इस क्षेत्र को वर्ष 2017 में कृष्ण मृग संरक्षित क्षेत्र घोषित किया था। कुलाचे भरते काले हिरणों की एक झलक देखने के लिए प्रयागराज के दूरस्थ इलाकों से ही नहीं रायबरेली, बांदा, प्रतापगढ़, कौशांबी, चित्रकूट के अलावा मध्य प्रदेश से भी बड़े पैमाने पर पर्यटक आते हैं।
तीन वर्ष पूर्व गणना में हिरणों की संख्या करीब 500 थी
करीब तीन वर्ष पूर्व इनकी गणना हुई थी। तक हिरणों की संख्या लगभग 500 के आसपास थी। अनुमान के आधार पर विभाग हिरणों की संख्या 600 से अधिक बता रहा है। इस साल जनवरी में अयोध्या स्थित आचार्य नरेंद्र देव विश्वविद्यालय की टीम से हिरणों की गणना कराने की तैयारी थी। हालांकि विभाग सिर्फ योजना ही बनाता रह गया। डीएफओ अरविंद कुमार का कहना है कि गणना को लेकर विश्वविद्यालय की टीम से फिर संपर्क किया जाएगा।
आसान नहीं गर्मी में सटीक गणना
जानकारों का कहना है कि सर्दी में संरक्षित क्षेत्र में न पानी की कमी होती है और न चारे की। धूप सेकने के चक्कर में यह ज्यादातर खुले मैदानों में रहते हैं। जबकि, गर्मी के दिनों में हिरण चारे-पानी व छांव की तलाश में कई-कई किमी दूर तक भटकते रहते हैं। एक जगह पर उनका मिलना मुश्किल होता है। ऐसे में अगर, गर्मी में गणना कराई भी गई तो वह ज्यादा सटीक नहीं होगी।