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    प्रयागराज की होली : वर्ष 1930 में अंग्रेजी सरकार हिंदुओं के पर्वाें पर कहर बरपाती थी, ऐसे में निकाली बैलगाड़ी पर होली बरात

    By Amerdeep Bhatt Edited By: Brijesh Srivastava
    Updated: Sun, 01 Mar 2026 04:20 PM (GMT+05:30)

    प्रयागराज में होली का एक समृद्ध इतिहास है। यहां लोकनाथ की होली अपनी वैभवशाली परंपराओं के लिए जानी जाती है, जबकि दारागंज में दमकल युद्ध की अनूठी परंपरा ...और पढ़ें

    प्रयागराज के लोकनाथ मुहल्ले में होली पर्व पर रंग-गुलाल में सराबोर होलियारे। जागरण आर्काइव

    प्रयागराज के लोकनाथ मुहल्ले में होली पर्व पर रंग-गुलाल में सराबोर होलियारे। जागरण आर्काइव

    HighLights

    1. संस्कृति की रखवाली और मतवालों की होली रही है संगम नगरी की परंपरा

    2. साहित्यकारों का महादेवी के घर लगता था जमघट, गीत व काव्यपाठ होते थे

    अमरदीप भट्ट, प्रयागराज। तीज त्योहारों की नगरी है प्रयागराज, यहां जिस उत्साह से उत्सव मनाए जाते हैं उनका वर्तमान ही नहीं, अतीत भी सुनहरा है। होली को मनाए जाने की बात ही निराली है। लोकनाथ की होली जितनी वैभवशाली उतनी ही संस्कारों वाली है। जानसेनगंज, दारागंज और कीडगंज की होली संस्कृति का एक अलग ही पाठ सिखाती है।

    रंग पर्व का अनूठा इतिहास

    रंगों के इस इस पर्व का इतिहास अनूठा है। एक दूसरे के प्रति आदर भाव, घर के बाहर बने चबूतरों पर बैठकी, गुझिया पापड़ खिलाने में झलकता प्रेम और बुजुर्गों का आशीर्वाद लेने की चाहत में उम्र का कोई बंधन नहीं रहता था। हालांकि समय के साथ बदल गया है होली का स्वरूप। लोकनाथ वह क्षेत्र है जो संस्कृति को आज भी संजोए है। 

    कपड़ा फाड़ होली का जलवा कायम है

    पुराने शहर में होली मनाने का लोगों का अंदाज प्रेमभाव से परिपूर्ण है। रंगों से होली खेलने और फिल्मी गीतों पर थिरकने के दौरान एक दूसरे के कपड़े फाड़कर उछाल देने की खुशी बीते दो दशक में परंपरा का रूप ले चुकी है। यह केवल लोकनाथ में ही नहीं, मुट्ठीगंज, कोठपारचा, अतरसुइया, बहादुरगंज, बलुआघाट, नखास कोहना, खुल्दाबाद, हिम्मतगंज और रेलवे स्टेशन पर भी दिखता है। शर्ट, टी-शर्ट, कुर्ते आदि फाड़ देने के बाद उसे उछाल कर बिजली के तारों, खंभों पर टांग देने की खुशी मन के उत्साह को और बढ़ा देती है।

    कपड़ा फाड़ होली अब एक परंपरा

    पुरनिये बताते हैं कि ऐसा दौर 2000 के बाद से आया। पहले तो कपड़े फाड़ने का कोई चलन नहीं था। अब होली कपड़ा फाड़ होती है लेकिन यह भी अनूठी है। तारों पर टंगे कपड़े देखने के लिए लोग दूर-दूर से आते हैं। व्यापारी पप्पन जी टंडन बताते हैं कि कपड़ा फाड़ होली अब एक परंपरा की तरह है और यही यथार्थ भी। यही परंपरा वर्तमान पीढ़ी के सामने शुरू हुई। कपड़े फाड़ने का कोई विरोध नहीं करता, यही भाईचारा है।

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    60 के दशक में लोकनाथ की होली

    नगर में होली का एक अप्रतिम दौर तब भी था जब लोकनाथ चौराहा के पास पूर्व विधायक कल्याण चंद्र मोहिले ‘छुन्नन गुरु’ का तख्त लगता था। 60 के दशक में लोकनाथ चौराहे के पास लगता था तख्त और रात में बड़े-बड़े कड़ाहे व ड्रम में भिगोए जाते थे टेसू के फूल। इससे पानी में लाल रंग गाढ़ा हो जाता था। न रासायनिक रंग हुआ करते थे न एक दूसरे से दुश्मनी निकालने की कोई प्रवृत्ति। एक दूसरे के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लेने, सुबह-सुबह घरों के दरवाजे पर पहुंचकर उत्साहपूर्वक आवाज लगाने, ढोलक, मजीरा और बीन बजाकर होली के लिए आमंत्रित करने की चुहल जरूर होती थी। नाच गाना और ‘होली है’ का उद्घोष करने से माहौल भी सतरंगी हो उठता था।

    भांग मिली ठंडई बनती थी

    लोकनाथ होली मिलन संघ के संरक्षक रवींद्र पांडेय बताते हैं कि जब वे 15 साल के थे तब तक का बोध है। रंग खेलने से पहले छुन्नन गुरु के आने का लोग इंतजार करते थे। भांग मिली ठंडई बनती थी, भांग पत्थर वाली सिलौटी पर पीसी जाती थी। पं. जवाहर लाल नेहरू, कवि डा. हरिवंश राय बच्चन भी आते थे। किसी होली पर जनेश्वर मिश्र आ जाएं तो मजा दोगुना हो जाता था। बैठ जाते थे तख्त पर बड़े बुजुर्ग, फिर शुरू हो जाता था होली खेलने का क्रम। होलिका दहन से ही गुलाल उड़ाने की शुरुआत हो जाती थी फिर अगले दो दिनों तक होली के रंग लोकनाथ और चौक में बरसते थे।

    इष्टदेव की पूजा कर करें गुरुमंत्र का जाप

    पाराशर ज्योतिष संस्थान के निदेशक आचार्य विद्याकांत पांडेय कहते हैं कि होली से ठीक पहले की रात में अपने इष्टदेव की पूजा करके गुरुमंत्र का जप करना चाहिए। यह अत्यंत कल्याणकारी है। अगले दिन पूर्णिमा पर पानी में गंगाजल मिलाकर स्नान करने के बाद होलिका तापने जाना चाहिए। भगवान शिव, भगवान विष्णु, मां लक्ष्मी, हनुमान जी का अभिषेक व पूजन करना चाहिए

    महादेवी वर्मा के घर जटते थे साहित्यकार 

    साहित्यकारों की होली कवयित्री महादेवी वर्मा के अशोक नगर स्थित आवास पर गीत, काव्यपाठ और ढोलक बजाकर नाच गाने के रूप में होती थी। सुमित्रानंदन पंत, फिराक गोरखपुरी, यश मालवीय, उमाकांत मालवीय, रघुवंश, अमृत राय, एहतराम इस्माल, सुधा चौहान आदि कवियों के पहुंचने से फाल्गुनी माहौल बन जाता था। महादेवी सभी की दीदी होती थीं और संरक्षक भी। कवि यश मालवीय बताते हैं कि रंग खेलते समय गीत गजलों का दौर शुरू हो जाता था। साहित्य, किस्से कहानियों के बीच खूब हंसी ठिठौली होती थी। प्रेम और संस्कार का जितना सुंदरतम स्वरूप हो सकता है महादेवी वर्मा उसका चित्रण करती थीं।

    दमकल युद्ध...अरे भई यह रंगों की बौछार है

    दारागंज में दमकल युद्ध की अद्वितीय परंपरा है। पं. धर्मराज पांडेय और नटेश शास्त्री ने इसकी शुरुआत की थी। किले में आग बुझाने के लिए जिस दमकल का इस्तेमाल होता था होली के अवसर पर उसे ही बैलगाड़ी से लाया जाता था और अलग-अलग स्थान पर रंग की बरसात की जाती थी। राकेट साबुन वाले, बाबू राम रस्तोगी, पं. रामअवतार पांडेय, बचई महाराज, भोलानाथ चकहा ने दमकल युद्ध की परंपरा को आगे बढ़ाया।

    धकाधक काव्य सम्मेलन भी एक परंपरा

    दारागंज में तो धकाधक काव्य सम्मेलन भी तीन दशक पुरानी परंपरा है। डा. शंभूनाथ त्रिपाठी, राजेंद्र तिवारी ‘दुकान जी’ ने पहले शिव मंदिर में इसकी शुरुआत कराई इसके बाद धकाधक के नाम से चौराहा हो गया। प्रयागराज सेवा समिति के अध्यक्ष तीर्थराज पांडेय ‘बच्चा भइया’ बताते हैं कि परंपरा को बनाए रखने के लिए जनसहभागिता महत्वपूर्ण होती है।

    कटरा से बैलगाड़ी पर निकलती थी होली बरात

    शहर के कटरा मुहल्ले में होली के दिन बैलगाड़ी से बरात निकालने की अनूठी परंपरा रही है। श्री कटरा व्यापार मंडल के अध्यक्ष गोपाल बाबू जायसवाल कहते हैं कि वर्ष 1970 तक इस यह बरात निकली। उसके बाद से स्वरूप बदलने लगा। इससे राष्ट्रीय एकता को बल मिलता था। बताया कि बैलगाड़ी पर बरात निकालने की शुरुआत वर्ष 1930 में हुई थी। तब अंग्रेजों का शासन था और हिंदुओं के त्योहारों पर सरकार कहर बरपाती थी।

    बड़े ड्रमों के पानी में घोला जाता था रंग  

    बताया कि कटरा में रंजन बाबू के घर के बाहर से होलियारों की बरात निकलती थी। दो या तीन बैलगाड़ी पर बड़े बड़े ड्रम रखे जाते थे। उसमें पानी भरा जाता था। रंग घोला जाता था। घोड़ा भी लाया जाता था। उस पर दुल्हा को बैठाया जाता और होली के मतवाले चल पड़ते थे।

    नौजवानों का जोश और जुनून दिखता था 

    मंसुरिया दीन, नरोत्तम दास अग्रवाल, तुलसीराम जायसवाल, डा. ज्वाला सिंह, धनश्याम दास जायसवाल, बड़कू बाबा, ओम प्रकाश जायसवाल, लल्लू मर्करी आदि बरात का नेतृत्व करते थे। बैलगाड़ी पर नवजवानों का जोश और जुनून दिखता था। पीतल की पिचकारियां लोगों के पास रहती थीं। रंगों की बौछार होती तो रास्ते में जगह-जगह होलियारों का स्वागत अभिनंदन किया जाता था।

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