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    विलुप्त ‘सरस्वती’ को मिलेगा नवजीवन, NGRI के वैज्ञानिकों ने खोजी है भूगर्भ में 200 किमी लंबी विलुप्त नदी

    Updated: Sat, 16 May 2026 08:16 PM (IST)

    प्रयागराज में भूगर्भ में मिली 200 किमी लंबी विलुप्त नदी, जिसे 'सरस्वती' माना जा रहा है, को अब पुनर्जीवित किया जाएगा। एनजीआरआई और राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा ...और पढ़ें

    विलुप्त ‘सरस्वती’ को मिलेगा नवजीवन।

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    जागरण संवाददाता, प्रयागराज। भूगर्भ के अंदर पतित पावनी गंगा के साथ-साथ बह रही जिस विलुप्त नदी की धारा को राष्ट्रीय भूभौतिकीय अनुसंधान संस्थान (एनजीआरआई), हैदराबाद ने खोजा था, अब उसे जीवनदान मिलेगा।

    वैज्ञानिक भले ही इसे विलुप्त नदी कहते हों, लेकिन आस्थावान ‘सरस्वती’ मान रहे हैं। कारण, यह जलधारा ठीक उसी जगह मिली है, जहां धार्मिक ग्रंथों व शास्त्रों में ‘सरस्वती’ को बताया गया है। सर्वेक्षण करने वाले वैज्ञानिक भी इसे स्वीकार करते हैं।

    इस विलुप्त नदी को पुनर्जीवित करने के लिए कौशांबी, फतेहपुर और कानपुर में जगह-जगह ग्राउंड वाटर रिचार्ज स्ट्रक्चर बनाए जाएंगे। इन्हें सीधे विलुप्त नदी की धारा से जोड़ा जाएगा। इससे बारिश का पानी संरक्षित होकर इस जलधारा को सदानीरा बनाएगा।

    विलुप्त हुई सरस्वती की तलाश वर्ष 2017 से शुरू हुई थी। परियोजना का पहला चरण केंद्रीय भूजल बोर्ड के सहयोग से वर्ष 2017 से लेकर 2019 तक चला। इसमें एनजीआरआई के वैज्ञानिकों ने प्रयागराज मंडल के कौशांबी जनपद के औधन से लेकर सिराथू तक करीब 45 किमी तक विलुप्त जलधारा खोजी। फिर वर्ष 2020 से लेकर 2023 तक चले दूसरे चरण में राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन ने परियोजना को अपना लिया।

    इसमें सिराथू से लेकर कानपुर तक करीब 145 किमी लंबी उसी विलुप्त नदी की धारा दिखी। एनजीआरआ के मुख्य वैज्ञानिक डा. सुभाष चंद्र बताते हैं कि सतह से करीब 10-15 मीटर नीचे भूगर्भ में यह विलुप्त नदी मिली है, जो गंगा के साथ-साथ चल रही है।

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    धरती के ऊपर गंगा की धारा जिधर घूमती है, नीचे विलुप्त नदी की धारा भी उसी जगह और उसी दिशा में घूमी हुई है। इस धारा की चौड़ाई भी गंगा के बराबर ही है। औधन के पास यह धारा यमुना से मिलती हुई दिखी है। उन्होंने बताया कि विलुप्त नदी की इस धारा में कहीं-कहीं पर पानी भी है, लेकिन सिर्फ नाम मात्र का।

    करीब 205 किमी तक विलुप्त नदी की खोज पूरी होने के बाद अब परियोजना में तीसरे चरण की शुरुआत होने जा रही है। इसमें विलुप्त नदी को संरक्षित करने का प्रयास किया जाएगा। इसके लिए जगह-जगह ग्राउंड वाटर रिचार्ज स्ट्रक्चर बनाकर बारिश के पानी को इस धारा तक पहुंचाया जाएगा। इससे उसका जलस्तर बढ़ेगा।

    दिसंबर में मिली स्वीकृति, जल्द शुरू होगा काम

    राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन से तीसरे चरण की परियोजना को दिसंबर-2025 में स्वीकृति मिली है। इसमें एनजीआरआइ के साथ उत्तर प्रदेश भूगर्भ जल विभाग भी काम करेगा। एनजीआरआइ के वैज्ञानिक ग्राउंड वाटर रिचार्ज स्ट्रक्चर की डिजाइन तय करेंगे। उसके लिए समुचित स्थल चुनेंगे। इसके बाद भूगर्भ जल विभाग ग्राउंड वाटर रिचार्ज स्ट्रक्चर बनवाएगा।

    एक साल में निर्माण, दो साल निगरानी

    परियोजना का तीसरा चरण तीन साल का है। इसमें एक साल के अंदर ग्राउंड वाटर रिचार्ज स्ट्रक्चर बनकर तैयार हो जाएंगे। इसके बाद अगले दो साल तक वैज्ञानिक उसकी निगरानी करेंगे। इसमें यह देखेंगे कि ग्राउंड वाटर रिचार्ज स्ट्रक्चर कितना काम कर रहे हैं।