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    प्रयागराज का ‘आलू बेल्ट’, बंपर पैदावार फिर भी क्यों खुश नहीं हैं किसान? लागत और भंडारण के गणित में उलझे

    By Digital Desk Edited By: Brijesh Srivastava
    Updated: Mon, 16 Feb 2026 04:42 PM (GMT+05:30)

    प्रयागराज के गंगापार इलाके में आलू की बंपर पैदावार से किसान चिंतित हैं। इस साल 20,845 हेक्टेयर में आलू की खेती हुई है, जिससे 8,000 मीट्रिक टन पैदावार ...और पढ़ें

    प्रयागराज आलू की बंपर पैदावार पर किसान क्यों चिंतित?

    प्रयागराज आलू की बंपर पैदावार पर किसान क्यों चिंतित?

    HighLights

    1. गंगापार इलाका पिछले तीन दशकों से आलू उत्पादन का गढ़ रहा है

    2. बाजार के मौजूदा दाम किसानों के उत्साह पर पानी फेर रहे हैं

    3. कच्चा आलू 650 से 800 रुपये प्रति क्विंटल के बीच बिक रहा 

    अमरीश मनीष शुक्ल, प्रयागराज। उत्तर प्रदेश के प्रयागराज जिले का गंगापार इलाका पिछले तीन दशकों से आलू उत्पादन का गढ़ रहा है। इस साल यहां की धरती ने सोना उगला है। आलू की ऐसी फसल, जिसे देखकर पहली नजर में किसी भी किसान का दिल बाग-बाग हो जाए। करीब 20,845 हेक्टेयर के विशाल क्षेत्र में फैली हरी-भरी फसल और 8,000 मीट्रिक टन की रिकार्ड पैदावार की संभावना ने कृषि जगत में हलचल मचा दी है।

    अन्नदाता चिंतित क्यों हैं?

    हालांकि खेतों में जैसे-जैसे खुदाई की मशीनें चल रही हैं, किसानों के माथे पर चिंता की लकीरें भी गहरी होती जा रही हैं। सवाल यह है कि क्या यह 'बंपर पैदावार' किसानों की झोली भरेगी, या लागत और भंडारण के गणित में उलझकर रह जाएगी?

    बाजार का गणित और किसानों की उलझन

    वर्तमान में गंगापार के बाजारों और खेतों में आलू की खुदाई का काम जोरों पर है। हालांकि, बाजार के मौजूदा दाम किसानों के उत्साह पर पानी फेर रहे हैं। इस समय कच्चा आलू 650 से 800 रुपये प्रति क्विंटल के बीच बिक रही है। विशेषज्ञों और किसानों का मानना है कि इस कीमत पर 'घाटा' तो नहीं है, लेकिन जिस 'बड़े मुनाफे' की उम्मीद में किसान साल भर पसीना बहाता है, वह कहीं नजर नहीं आ रहा।

    खेत से सीधे आलू बेचने में जोखिम कम

    लोकापुर के किसान जीत लाल पटेल एक व्यावहारिक रास्ता अपना रहे हैं। वे कहते हैं, "खेत से सीधे आलू बेचने में जोखिम कम है। मैंने अपनी चार बीघे की फसल 800 रुपये प्रति क्विंटल की दर से बेच दी है। इसमें कम से कम लागत निकल आई और थोड़ा मुनाफा हाथ में है।" जीत लाल जैसे कई किसान 'नकद नारायण' की नीति पर चल रहे हैं, लेकिन सबकी सोच ऐसी नहीं है।

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    किस्मों के आधार पर बाजार का हाल

    बाजार में आलू की विभिन्न किस्मों के दाम उनकी गुणवत्ता और मिठास के आधार पर तय हो रहे हैं।

    आलू की किस्म              विशेषता                       वर्तमान मूल्य (रुपये प्रति क्विंटल) |

    जी-फोर (G-4)       प्रीमियम क्वालिटी, बड़ी और चमकदार          700 - 800 
    मिश्रित आलू          औसत गुणवत्ता                                          650 - 700 
    गोला आलू            गोल आकार, हल्का मीठा                            500 - 550 

    कोल्ड स्टोरेज : उम्मीद का 'महंगा' दांव

    एक मार्च तक आलू की फसल पूरी तरह पककर तैयार हो जाएगी। इसके बाद शुरू होगा असली 'जोखिम का खेल'। कच्चा आलू लंबे समय तक बाहर नहीं रखा जा सकता क्योंकि उसमें सड़न का डर रहता है। ऐसे में किसानों के पास एक ही विकल्प बचता है कोल्ड स्टोरेज (शीतगृह)। किसान आशीष शुक्ला इस गणित को विस्तार से समझाते हैं।

    कोल्ड स्टोरेज में आलू रखने का खर्च मामूली नहीं

    किसानों के अनुसार, कोल्ड स्टोरेज में आलू रखने का खर्च मामूली नहीं है। “एक 50 किलो के बोरे पर भंडारण और हैंडलिंग का करीब 250 रुपये अतिरिक्त खर्च आता है। यानी एक क्विंटल पर 500 रुपये का खर्च बढ़ जाएगा। इसका मतलब है कि जो आलू आज हमें 700-800 रुपये का पड़ रहा है, कोल्ड स्टोरेज में जाने के बाद उसकी लागत बढ़कर 1,200 रुपये प्रति क्विंटल हो जाएगी।” यह एक बड़ा निवेश है। अगर भविष्य में कीमतें 1,200 रुपये से ऊपर नहीं गईं, तो किसान को कोल्ड स्टोरेज से आलू बाहर निकालने का भाड़ा भी अपनी जेब से भरना पड़ सकता है।

    क्या कहते हैं आलू व्यापारी?

    व्यापारियों के बीच भविष्य की कीमतों को लेकर दो फाड़ दिख रहे हैं। देश भर में आलू की सप्लाई करते हैं। अगले एक महीने के भीतर ही मांग बढ़ेगी और दाम में 200 रुपये प्रति क्विंटल तक का उछाल आ सकता है। हमें उम्मीद है कि सितंबर-अक्टूबर 2026 तक आलू के दाम 1,650 से 1,950 रुपये के स्तर को छू सकते हैं।
    - चंद्रभान मौर्य, सहसों

    थोड़ी सावधानी बरतने की जरूरत है। इस साल उत्पादन इतना अधिक (बंपर) हुआ है कि बाजार में आवक बहुत ज्यादा रहेगी। ऐसे में कीमतों में बहुत बड़ी बढ़ोत्तरी की संभावना कम है; दाम 50-100 रुपये के दायरे में ही ऊपर-नीचे होते रहेंगे।
    - अजीत कुमार, ददौली

    जोखिम और 'सुनहरे दाम' की आस

    गंगापार के हजारों किसान इस समय एक चौराहे पर खड़े हैं। एक तरफ सुरक्षित मुनाफा है (खेत से सीधे बेचना) और दूसरी तरफ एक बड़ा जोखिम भरा निवेश (कोल्ड स्टोरेज)। किसान इस उम्मीद में अपना आलू डंप करने की तैयारी कर रहे हैं कि साल के अंत तक कीमतें दोगुनी हो जाएंगी। यह केवल खेती का मामला नहीं, बल्कि एक आर्थिक जुआ है। यदि व्यापारियों का अनुमान सही निकला और कीमतें 1,900 रुपये तक पहुंचीं, तो गंगापार के किसान मालामाल हो जाएंगे। लेकिन यदि उत्पादन की अधिकता ने कीमतों को दबाए रखा, तो 'बंपर पैदावार' किसानों के लिए 'बंपर बोझ' बन सकती है।

    बाजार से क्या करें उम्मीद

    फिलहाल, गंगापार की सड़कों पर आलू से लदी ट्रैक्टर-ट्रालियां और खेतों में काम करते मजदूर एक ही कहानी कह रहे हैं, मेहनत में कोई कमी नहीं थी, अब सारा दारोमदार बाजार की अनिश्चितता पर है। किसान आशीष शुक्ला बोले कि खेती अब केवल हल चलाने का नाम नहीं, बाजार को समझने का हुनर बन गई है। हम जोखिम उठा रहे हैं, देखते हैं मिट्टी इस बार क्या मोल देती है।

    किसानों के समक्ष संकट 

    यह कोई पहली बार नहीं जब आलू किसानों के सामने संकट है। हर साल कुछ न कुछ ऐसा होता है कि किसान कि खुशी अचानक चिंतन में बदल जाती है। बीते तीन साल से यही कुचक्र चल रहा है। किसानों का कहना है कि अगर आपको आलू के खेत में ग्रीष्म कालीन कोई खेती करनी है वह अ्ग्रिम तो 800 रुपये कीमत खराब नहीं है, आलू खेत में बेंच दे। अगर खेती नहीं करनी है और इस बार उर्वरा बढ़ाने के लिए ढैंचा सनई या हरी खाद का प्रबंधक कर रहे हैं तो आलू को पकने दे और कोल्ड स्टोरेज की प्लानिंग करें। अगर दाम इस बीच 200 बढ़ गए तो हाथों हाथ आलू बेंच दें, अन्यथा उसे रख दें। रिश्क तो रहेगा लेकिन उम्मीद भी रहेगी मुनाफे की।

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