Tribute Pratyush : भारतीय टीम की जर्सी पहनकर देश के लिए खेलना प्रत्यूष का सपना था, अब सिर्फ यादें...
Tribute Pratyush प्रयागराज के वालीबाल के राष्ट्रीय खिलाड़ी प्रत्यूष का असामयिक निधन हो गया। प्रत्यूष का सपना भारतीय टीम के लिए खेलना था, जिसके लिए वह ...और पढ़ें

Tribute Pratyush प्रयागराज में वालीबाल के राष्ट्रीय खिलाड़ी प्रत्यूष राय के निधन पर खेल जगत में शोक का माहौल है।
HighLights
वालीबाल खिलाड़ी ने 'खेलो इंडिया गेम्स' में चयन के बाद दैनिक जागरण से साझा किए थे विचार
प्रत्यूष ने कहा था- 'पैर का पसीना जब सिर तक जाता है, तभी असली मेहनत होती है
प्रयागराज के म्योहाल स्पोर्ट्स कांप्लेक्स में संदिग्ध मौत से खेल जगत में शोक का माहौल्
अमरीश मनीष शुक्ल, प्रयागराज। Tribute Pratyush खेल के मैदान में जब कोई खिलाड़ी अपनी पूरी ताकत झोंक देता है तो उसकी मेहनत की महक दूर तक जाती है। 14 वर्ष की उम्र में जब एक डरा-सहमा बच्चा प्रयागराज की धरती पर कदम रख तो किसी ने नहीं सोचा था कि वह अनुशासन और पसीने के दम पर शून्य से शिखर तक का सफर इतनी तेजी से तय कर लेगा। यह कहानी प्रत्यूष की है।
नियति को कुछ और ही था मंजूर...
Tribute Pratyush प्रत्यूष जिसका सपना भारतीय टीम की जर्सी पहनकर देश के लिए खेलना था, लेकिन अफसोस कि नियति को कुछ और ही मंजूर था। प्रत्यूष राय सिर्फ खेलता नहीं था, वह मैदान पर तपस्या करता था। 29 अप्रैल 2025 को जब उसका चयन 'खेलो इंडिया गेम्स' में हुआ, तो उसने दैनिक जागरण से फोन पर बातचीत करते हुए बड़े गर्व से कहा था- 'पैर का पसीना जब सिर तक जाता है, तभी असली मेहनत होती है, मैं इस वक्त वही कर रहा हूं।' उसके लिए वालीबाल सिर्फ एक खेल नहीं, बल्कि वह सीढ़ी थी जिससे उसे शिखर छूना था। यूपी की टीम से लेकर भारतीय टीम तक का उसका सफर उसकी इसी जिजीविषा का परिणाम था।

खेल में लहराया था परचम
Tribute Pratyush अभी दिसंबर 2025 की ही तो बात है, जब गोरखपुर में महंत अवैद्यनाथ प्राइज मनी प्रतियोगिता में प्रत्यूष की टीम ने जीत का परचम लहराया था। वह उस टूर्नामेंट का बेस्ट प्लेयर था। राजस्थान में जूनियर नेशनल खेलने के बाद वह कुछ समय के लिए अपने गांव सौरी गया था। बहन की शादी की खुशियां थीं, परिवार का साथ था, लेकिन कोच वीर सिंह को उसकी प्रैक्टिस की चिंता थी। वह बताते हैं कि - जून-जुलाई में एशियाई चैंपियनशिप होनी थी। स्टेडियम से उसे कई बार फोन किया गया कि हॉस्टल लौट आओ, प्रैक्टिस प्रभावित हो रही है। कोच के बुलावे पर वह दो दिन पहले ही जोश के साथ लौटा था। किसी ने नहीं सोचा था कि यह उसकी आखिरी वापसी होगी।
सोमवार को मैच खेलने गया था मेजा
सोमवार का दिन भी आम दिनों जैसा ही था। मेजा में एकदिवसीय प्रतियोगिता खेलकर प्रत्यूष शाम को हास्टल लौटा। साथियों के साथ बैठकर खाना खाया, हंसी-मजाक हुआ और फिर वह सोने चला गया। हास्टल का नियम है कि दरवाजा अंदर से बंद नहीं होगा। वही खुला दरवाजा मंगलवार की सुबह एक ऐसी खबर लेकर आई जिसने पूरे म्योहाल स्टेडियम को स्तब्ध कर दिया। जब एक जूनियर खिलाड़ी उसे जगाने कमरे में दाखिल हुआ, तो प्रत्यूष वहां था, लेकिन उसकी आत्मा मैदानों की सरहदें पार कर चुकी थी। वह खिलाड़ी जो अपनी बेमिसाल फिटनेस और फुर्ती के लिए जाना जाता था, जिसने पसीने को अपनी ताकत बनाया था, वह आज गहरी और अनंत नींद में सो गया था।
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नहीं पहन सका नीली जर्सी
प्रत्यूष ने शून्य से शिखर तक का सफर तो तय कर लिया, लेकिन नीली जर्सी पहनकर अंतरराष्ट्रीय कोर्ट पर उतरने का उसका सपना अब एक टीस बनकर हवाओं में तैर रहा है। प्रयागराज के खेल जगत ने आज न सिर्फ एक खिलाड़ी खोया है, बल्कि मेहनत की उस परिभाषा को खो दिया है जो कहता था— पसीना जब सिर तक जाए, तभी मंजिल मिलती है।