संस्थान पर लागू नहीं होने वाले कानून के तहत हुई नियुक्ति मानी जाएगी रद: हाई कोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया है कि किसी संस्थान पर लागू न होने वाले कानून के तहत की गई नियुक्तियां रद्द मानी जाएंगी। ...और पढ़ें
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HighLights
संस्थान पर लागू न होने वाले कानून की नियुक्तियां रद्द।
बर्खास्तगी आदेश में कारण स्पष्ट न होने पर भी वैध।
गलत नियमों से हुई नियुक्ति पर सुनवाई अप्रासंगिक।
विधि संवाददाता, प्रयागराज। किसी ऐसे कानून के तहत की गई नियुक्तियां, जो उस संस्थान पर लागू नहीं होता, वे रद मानी जाएंगी। ऐसे कर्मचारियों की बर्खास्तगी के आदेशों को केवल इस आधार पर रद नहीं किया जा सकता कि आदेश में बर्खास्तगी के कारणों का स्पष्ट उल्लेख नहीं है। यदि वे नियम, जिनके तहत नियुक्तियां की गईं, उस संस्थान पर लागू ही नहीं होते थे तो फिर उन नियमों के तहत निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया गया या नहीं, यह तथ्य पूरी तरह अप्रासंगिक हो जाता है।
इस तरह की प्रक्रिया का पालन करने से नियुक्तियां वैध नहीं हो जाएंगी। किसी ऐसे कानूनी दायरे के तहत प्रक्रिया का पालन करना, जो लागू ही नहीं होता, अधिकार क्षेत्र की बुनियादी कमी को दूर नहीं करता। यह आदेश न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान ने बेसिक शिक्षा अधिकारी के बर्खास्तगी आदेश को चुनौती वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया।
कोर्ट ने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में भले ही अधिकार क्षेत्र की कमी और विवादित आदेश के कारणों का स्पष्ट उल्लेख न होने के संबंध में कुछ तर्क दिए गए हों, लेकिन ये तर्क महत्वहीन हो जाते हैं और इन पर अलग से विचार करने की आवश्यकता नहीं है।
याचियों की ओर से दलील दी गई थी कि उनका संस्थान यूपी बेसिक शिक्षा अधिनियम 1972 के तहत मान्यता प्राप्त था और उनकी नियुक्तियां यूपी मान्यता प्राप्त बेसिक शिक्षा (जूनियर हाईस्कूल) (शिक्षकों की भर्ती और सेवा शर्तें) नियमावली, 1978 द्वारा नियंत्रित होती थीं।
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2006 में संस्थान को यूपी इंटरमीडिएट शिक्षा अधिनियम के तहत हाई स्कूल स्तर तक उन्नत (अपग्रेड) कर दिया गया, लेकिन उस समय पदों के सृजन के लिए कोई प्रविधान नहीं था।मामले के तथ्यों के अनुसार, बेसिक शिक्षा अधिकारी ने शिक्षकों के चार पदों के विज्ञापन के लिए अनुमति दी, जो पिछले नियुक्त कर्मचारियों के सेवानिवृत्त होने के बाद रिक्त हो गए थे।
चयन प्रक्रिया के बाद प्रबंध समिति ने नियुक्ति पत्र जारी कर दिए। बाद में उदय नारायण मिश्र की शिकायत पर जांच की गई और याचियों को बर्खास्त कर दिया गया। इस आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी गई। कहा गया कि याचियों को सुनवाई का अवसर नहीं दिया गया।
बर्खास्त करने से पहले कोई नियमित जांच नहीं की गई जबकि उनकी नियुक्ति उचित प्रक्रिया का पालन करते हुए की गई। कोर्ट ने कहा कि एक बार जब संस्था को हाई स्कूल स्तर तक अपग्रेड किया गया, तो 1978 के नियम अब संस्था में नियुक्तियों पर लागू नहीं होते थे। जब याचियों की नियुक्ति संस्था पर लागू होने वाले नियमों के तहत नहीं हुई तो याचियों को सुनवाई का मौका देने का कोई फायदा नहीं था।