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    यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Sep 26, 2019 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

    समस्याएं नजर अंदाज कर, हर पल खुश रहने की कोशिश करें

    By JagranEdited By:
    Updated: Fri, 27 Sep 2019 06:27 AM (GMT+05:30)

    प्रतिस्पर्धा के दौर में सभी जाने-अनजाने तनाव से ग्रस्त हैं। तनाव के कारण जिदगी बोझ लगने लगती है इससे उबरने का एकमात्र उपाय है स्वयं को समझाना। ...और पढ़ें

    समस्याएं नजर अंदाज कर, हर पल खुश रहने की कोशिश करें
    समस्याएं नजर अंदाज कर, हर पल खुश रहने की कोशिश करें

    सहारनपुर, जेएनएन। प्रतिस्पर्धा के दौर में सभी जाने-अनजाने तनाव से ग्रस्त हैं। तनाव के कारण जिदगी बोझ लगने लगती है, इससे उबरने का एकमात्र उपाय है स्वयं को समझाना। छोटी-छोटी समस्याओं को नजर अंदाज करते हुए छोटी-छोटी बातों में प्रसन्नता तलाश कर हर पल खुश रहने की मानसिकता विकसित करनी चाहिए।

    गुरुवार को ज्वाला नगर स्थित नेशनल पब्लिक स्कूल में दैनिक जागरण संस्कारशाला के अंतर्गत आयोजित कार्यशाला में उप प्रधानाचार्या सिपल मकानी ने कहा कि हर कार्य को उचित ढंग से पूर्ण मेहनत व लगन से करना ही हमारे हाथ में है। सफल-असफल होना परिस्थितियों व कुछ हद तक भाग्य द्वारा निर्धारित होता है। अत: असफल होने का डर फिजूल है। हमारा हर काम अपने हिसाब से, जो उचित हो होना चाहिए। आप सबको प्रसन्न नहीं रख सकते इसीलिए जिसमें आपका, आपके परिवार का, समाज का हित हो, कीजिए। उन्होंने कहा कि कई बार तनाव की वजह चाहे छोटी हो तुच्छ हो या बड़ी, वह शरीर पर नकारात्मक प्रभाव डालती है। तनाव तन, मन व दिमाग को बीमार बनाता है। जीवन के प्रति काम के प्रति उदासीनता आने लगती है वह हर परिस्थिति में नाखुश, उदास व असंतोषी ही लगता है और धीरे-धीरे वह इसकी आदत बना लेता है। हम किसी को बदल नहीं सकते। हर कोई अपने विचार व स्वभाव अनुसार ही व्यवहार करेगा अत: लोगों को बदलने का प्रयास कर दुखी होने से अच्छा है कि हम स्वयं में बदलाव लाएं। अधिकतर दुख व निराशा हाथ लगती है, जब हम बच्चों, परिवारजनों, रिश्तेदारों या दोस्तों से अपेक्षाएं रखने लगते हैं। किसी से कोई अपेक्षा न रखते हुए अपने कर्तव्य को पूर्ण करना आपको अधिक खुश रखेगा।

    उन्होंने कहा कि कई बार कुछ लोग अपने शारीरिक, मानसिक व सामाजिक जरूरत से अधिक महत्व दे उन्हीं का रोना रोते हैं। उन्हें लगता है कि वे ही सबसे ज्यादा पीड़ित, प्रताड़ित हो अन्याय को सहन कर रहे हैं, दूसरों के दुखों व परेशानी के आगे अपनी परेशानी कितनी छोटी है, इसे स्वयं को समझाने से ही सदा प्रसन्न रहा जा सकेगा। हमारे दुखों का सबसे बड़ा कारण होता है कि हम हमारे जीवन व परिस्थितियों की दूसरे से सदैव तुलना करते रहते हैं। फिर वे हमारे भाई-बहन हों, सहकर्मी, पड़ोसी या रिश्तेदार। जिस दिन हम अपनी उपलब्धियों व सफलता में खुश होना और उससे भी ज्यादा दूसरों की खुशी में, सफलता में सच्चे मन से सहभागी होना सीख लेंगे यकीन मानिए सभी तनाव दूर हो अजीब-सी खुशी का अनुभव होगा।

    अध्यापिका शिवांगी वर्मा ने कहा कि कुछ समय बीतने के बाद समस्या की गंभीरता स्वयं ही कम हो जाती हैं। कोई परेशानी, कोई मुसीबत, कोई बीमारी जीवन से बड़ी नहीं हो सकती। जीवन का हर क्षण पूर्व निर्धारित, पूर्व नियोजित ईश्वर द्वारा निर्धारित है, तो हमें चिता करने की, तनाव लेने की क्या आवश्यकता है? अपने प्रयत्नों व प्रयासों से हमें केवल और केवल परिस्थितियों को धैर्य, साहस व उच्च मनोबल से सामना करते हुए उन्हें अनुकूल बनाने व उन्हीं परिस्थितियों में खुश रहने का प्रयास करना है। सफलता व विफलता एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जीत के लिए प्रयत्नों की पराकाष्ठा हो, पर हार स्वीकारने की भी मानसिकता विकसित करें। अधिक से अधिक अच्छा सोचें, अच्छा करें, दूसरों की अच्छाई की सराहना करें। समय निकालकर आत्म अवलोकन करें। अपनी कमियां उदारता से स्वीकारें व दूसरों के गुणों की जी खोलकर प्रशंसा करने से धीरे-धीरे आत्मिक सुख मिलेगा व तनाव दूर होगा। अंत में इतना समझ लें कि सुख-दुख, हार-जीत व सफलता-विफलता जीवन का अहम हिस्सा है। इन्हीं के साथ से जीवन को गति मिलती है। ईश्वर-प्रदत्त जीवन एक वरदान है इसके हर पल को चुनौती समझ सहजता व सरलता से खुशी-खुशी जीवन को बिताइए। ---इनसेट---

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