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सहारनपुर मस्जिद केस: 315 वर्गमीटर विवादित जमीन के फैसले में लगे 477 दिन, 3 घंटे में हुई धराशायी

Published: Sun, 06 Sep 2026 10:05 AM (IST)Updated: Sun, 06 Sep 2026 10:19 AM (IST)

सहारनपुर में 315 वर्गमीटर विवादित सरकारी जमीन पर बनी मस्जिद को अवैध घोषित कर ध्वस्त कर दिया गया। इस फैसले ...और पढ़ें

मस्जिद ढहाती जेसीबी। फाइल।

मस्जिद ढहाती जेसीबी। फाइल।

HighLights

  1. विवादित 315 वर्गमीटर सरकारी जमीन पर बनी मस्जिद ध्वस्त

  2. अवैध निर्माण पर फैसला आने में लगे 477 दिन

  3. मस्जिद को गिराने में लगे मात्र तीन घंटे

जागरण संवाददाता, सहारनपुर। कलेक्ट्रेट परिसर में 315 वर्गमीटर विवादित जमीन पर बनी मस्जिद के अवैध रूप से सरकारी जमीन पर बनाए जाने का फैसला आने में 477 दिन लग गए, जबकि जनपद न्यायाधीश की अवर न्यायालय के फैसले पर मुहर लगने तीसरे दिन इसके धराशायी होने में महज तीन घंटे का वक्त लगा।

जांच के बाद 24 मार्च 2025 को हल्का लेखपाल ने वाद दाखिल किया, जिस पर इसी साल 16 जुलाई को न्यायालय ने अपने 37 पेज के निर्णय में मस्जिद को अवैध निर्माण घोषित किया।

24 मार्च 2025 को नगर मजिस्ट्रेट के न्यायालय में दाखिल हुआ था वाद

पठानपुरा हल्के के लेखपाल नीरज कुमार ने 24 मार्च 2025 को दाखिल वाद में बताया था कि खसना नंबर-539 का रकबा 28.04 बीघा पुख्ता राजस्व अभिलेखों में कचहरी-कलक्ट्रेट परिसर राजस्व अभिलेखों में दर्ज है। परिसर में डाकघर स्थित है। डाकघर के स्थान पर अन्य कार्यालय स्थापित करने के लिए डाकघर को विश्रामस्थल में स्थानांतरित किया गया।

यह विश्रामस्थल वादकारियों की सुविधा के लिए बनाया गया था, लेकिन जांच में सामने आया कि कुछ लोग भूतल व ऊपरी मंजि पर अवैध रूप से कब्जा कर नमाज पढ़ने-पढाने का काम कर रहे है। साथ ही डाकघर से किराया भी वसूला जा रहा है। इसमें सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड के कूटरचित अभिलेख भी दर्शाए गए।

16 जुलाई को आया फैसला

इस पर नगर मजिस्ट्रेट न्यायालय की ओर से मस्जिद पक्ष को 16 अप्रैल 2025 को नोटिस जारी किए गए, जिसके जवाब में उन्होंने तर्क दिया कि वादग्रस्त भूमि खसरा-539 का जमीदारी खत्मा अभी तक नहीं हुआ है, जिसकी मिल्कीयत अभिलेख खेवट से प्रदर्शित होती है। साथ ही सरकार ने उक्त भूमि को न तो खरीदा और न ही अधिग्रहित किया।

20 फीट ऊंची टाइफ ऑफ कंस्ट्रक्शन ब्रिटिश कॉलोनीज के हिसाब से बनी है

सरकारी इमारतें 20 फीट ऊंची टाइफ ऑफ कंस्ट्रक्शन ब्रिटिश कॉलोनीज के हिसाब से बनी है, जबकि मस्जिद का निर्माण टाइप ऑफ इस्लामिक कंस्ट्रशन के मुताबिक है। ऐसे में निर्माण सरकार ने नहीं कराया है। सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड को पक्षकार नहीं बनाए जाने की दलील के साथ ही साक्ष्य के तौर पर एक जनवरी 1911 को जारी विद्युत कनेक्शन प्रमाण पत्र सहित नगर निगम में जमा कर की रसीदें व वक्फ व पोस्ट ऑफिस के बीच 3 नवंबर 1994 को हुआ लीज एग्रीमेंट प्रस्तुत किए।

नगर मजिस्ट्रेट न्यायालय के पीठासीन अधिकारी कुलदीप कुमार ने बिजली कनेक्शन व नगर निगम से वार्षिक कर निर्धारण को स्वामित्व के अधिकार के लिए उपयुक्त नहीं माना।

जनपद न्यायाधीश ने दो सितंबर को अवर न्यायालय के फैसले को रखा बरकरार, 26 पेज का निर्णय

न्यायालय ने माना कि नान जेड ए खसरा संख्या-539 पर फसली वर्ष 1324, 1359 में कलक्ट्रेट-कचहरी के रूप में दर्ज है। इस पर न्यायालय पीठासीन अधिकारी कुलदीप सिंह ने 315 वर्ग मीटर पर अवैध रूप से कब्जा कर बनाई मस्जिद से बेदखल करते हुए इसे सरकारी संपत्ति घोषित किया। साथ ही पांच प्रतिशत की ब्याज दर से सर्किल रेट व क्षेत्रफल के आधार पर 70 साल से अवैध कब्जे की क्षतिपूर्ति के लिए छह करोड़ इक्तालीस लाख पैंसठ हजार पांच सौ रुपये वसूलने का आदेश दिया।

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तोड़कर बनाई गई नई मस्जिद में कई कमरे

मस्टजिद में एक बड़ा व एक छोटा हाल बना था, जिसमें नमाज पढ़ी जाती थी। एक वजूखाना और मौलवी के लिए हुजरे के एक कमरा था। इनके अतिरिक्त चार और कमरे भूतल पर थे। ऊपरी मंजिल पर दो हाल, वाशरूम व कमरे का निर्माण किया गया था।