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    151 साल बाद भी टस से मस नहीं हुआ ये पुल, बरेली-अलीगढ़ रूट पर आज भी बिना रुके दौड़ती हैं ट्रेनें

    Updated: Thu, 02 Apr 2026 04:31 PM (GMT+05:30)

    राजघाट गंगा घाट पर 1874 में बना ब्रिटिशकालीन रेलवे पुल 151 साल बाद भी मजबूत है। लोहे का यह पुल 32 पिलरों पर टिका है और आज भी इस पर सवारी व मालगाड़ियां ...और पढ़ें

    गंगा पर अंग्रेजों द्वारा बनाया गया पुल। जागरण

    गंगा पर अंग्रेजों द्वारा बनाया गया पुल। जागरण

    HighLights

    1. 1874 में बना लोहे का पुल झेल चुका है कई भीषण बाढ़, आज भी उसी मजबूती से दौड़ रही हैं ट्रेनें

    संवाद सूत्र, बबराला (संभल)। राजघाट गंगा घाट पर बना ब्रिटिशकालीन रेलवे पुल आज भी अपनी मजबूती और विश्वसनीयता के कारण लोगों के लिए आश्चर्य का विषय बना हुआ है। करीब 151 वर्ष पूर्व अंग्रेजों द्वारा निर्मित यह पुल समय की कसौटी पर खरा उतरने के साथ ही आज भी उस पर सवारी और माल गाड़ियां सुचारु रूप से संचालित हो रही हैं। खास बात यह है कि इतने लंबे समय के बाद भी पुल में कोई बड़ी तकनीकी समस्या सामने नहीं आई है।

    बरेली-अलीगढ़ रेल मार्ग पर स्थित राजघाट गंगा घाट का यह ऐतिहासिक पुल पांच जून 1874 को बनकर तैयार हुआ था। लोहे से निर्मित यह पुल 32 मजबूत गोलों (पिलरों) पर टिका हुआ है, जो इसकी मजबूती की सबसे बड़ी पहचान है। निर्माण के समय इस पुल पर कुल 822103 रुपये की लागत आई थी, जिसका उल्लेख रेलवे द्वारा लगाए गए एक शिलालेख पर भी अंकित था।

    यह पुल अपने निर्माण के समय से लेकर अब तक बिना किसी बड़ी क्षति के खड़ा है। वर्ष 1924 और 2010 की भीषण बाढ़ को भी इस पुल ने मजबूती से झेला, जो इसकी इंजीनियरिंग गुणवत्ता को दर्शाता है। समय-समय पर इसकी मरम्मत जरूर की जाती रही है, लेकिन मूल संरचना आज भी वैसी ही बनी हुई है।

    वर्तमान में इस पुल पर सवारी गाड़ियां, मालगाड़ियां, साइकिल और पैदल यात्री नियमित रूप से आवागमन करते हैं। रेलवे ने इसी पुल के पिलरों पर लोहे के क्लैंप लगाकर 16 बिजली के पोल स्थापित किए हैं, जिनके माध्यम से इलेक्ट्रिक लाइन संचालित की जा रही हैं और ट्रेनों का संचालन सुचारु रूप से जारी है।

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    इस पुल के आसपास का क्षेत्र भी धार्मिक और ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। शिलालेख के अनुसार, गंगा नहर हरिद्वार से निकलकर राजघाट होते हुए इलाहाबाद की ओर जाती है। पुल से करीब सात किलोमीटर दूर कर्णवास स्थित है, जहां दानवीर राजा कर्ण द्वारा सवा मन सोना दान करने की मान्यता है।

    वहीं लगभग 10 किलोमीटर दूरी पर नरौरा परमाणु केंद्र और वेदांत मंदिर स्थित हैं, जो दर्शनीय स्थल के रूप में प्रसिद्ध हैं। अमावस्या और पूर्णिमा के अवसर पर यहां मेले भी लगते हैं, जिनमें दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंचते हैं। यात्रियों की सुविधा के लिए यहां निजी धर्मशालाओं की भी व्यवस्था है। करीब डेढ़ सदी पुराना यह पुल आज भी भारतीय रेल और अंग्रेजों की इंजीनियरिंग का जीवंत प्रमाण बना हुआ है।


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