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    संभल: गलियों से गायब हुआ हिंसा का दर्द और डर, बाजार में बसा खुशनुमा माहौल

    Updated: Thu, 06 Aug 2026 01:23 AM (IST)

    संभल में हिंसा प्रभावित इलाकों में अब डर और तनाव खत्म हो गया है। बाजार फिर से गुलजार हैं और लोग बिना किसी चिंता के खरीदारी कर रहे हैं, जिससे सामान्य ज ...और पढ़ें

    संभल में हिंसा का खौफ खत्म, बाजार गुलजार और लोग बेखौफ

    संभल में हिंसा का खौफ खत्म, बाजार गुलजार और लोग बेखौफ

    HighLights

    1. हिंसा प्रभावित दीवारों की मरम्मत हुई, डर खत्म।

    2. बाजार फिर से गुलजार, ग्राहक बिना चिंता के आ रहे।

    3. संभल में सांप्रदायिक सौहार्द बढ़ा, सामान्य जीवन बहाल।

    दिलीप कुमार, संभल। बुधवार का दिन...करीब पांच बजे का वक्त। स्थान वही, जहां 24 नवंबर 2024 को हिंसा भड़की थी। गाेलियां चलने से दीवारें जर्जर हुईं थीं और जमीन पर बने निशां पथराव की गवाही दे रहे थे। हर चेहरा खौफजदा था और बाजार बंद हो गया। लेकिन, अब वहां का माहौल एकदम है। बाजार गुलजार हैं।

    हिंसा का दर्द और डर दोनों गायब हैं। जहां खौफ था, वहां अब खुशनुमा माहौल है। ग्राहक बिना किसी चिंता के हिंसा वाले इलाके में आ-जा रहे हैं। दुकानदारों को सिर्फ ग्राहकों का इंतजार है। हां, पुलिस का पहरा बरकरार है। क्योंकि हिंसा से जुड़े प्रकरणों का दौर भी जारी है।

    मुहल्ला कोर्टगर्वी के उस इलाके में पहुंचकर स्थिति को देखा तो सबकुछ बदला हुआ नजर आया। कपड़ा व्यापारी मोहम्मद नदीम से जिक्र किया तो बोले कि अरे, भाईजान अब काहे उस कलंकित दिन का जिक्र करते हो। उससे न सिर्फ माहौल बिगड़ा था बल्कि व्यापार भी ठप हो गया था। अब इतने दिन बाद कुछ पटरी पर लौटा है। क्योंकि बहुत दिनों तक बाजार ही बंद रहा था।

    इसी दुकान पर कपड़ा खरीद रहीं नाजिया ने बताया कि अब बाजार में आने से कोई डर नहीं लगता है। क्योंकि जामा मस्जिद के पीछे हिंसा प्रभावित गली में पैदल चलते लोग, दुकानों के बाहर खड़े ग्राहक, वाहनों की आवाजाही और रोजमर्रा की भागदौड़ शहर के बदल चुके माहौल की तस्वीर पेश कर रही है।

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    कास्मेटिक की दुकान चलाने वाले नबील अहमद और संजीव रस्ताेगी भी अपनी दुकानों बैठकर बतिया रहे थे। एक दूसरे का हालचाल पूछने लगे। उन्हें देखकर सामने के दुकानदार गुलशन गंभीर हंसकर बोले, अब तो खरीदारी शुरू हो गई है। अपनी अपनी दुकानों पर बैठो।

    तभी रमीज राजा ने कहा कि ऐसा लगता है जैसे तीन वर्ष पहले का वह दौर अब पीछे छूट चुका है। किसी को कारोबार की चिंता है तो कोई परिवार की जरूरतें पूरी करने में लगा है। युवा अपने रोजगार और पढ़ाई को लेकर आगे बढ़ रहे हैं।

    सुबह दुकान खोलने के बाद दोनों संप्रदाय के लोग दुकानों पर बैठकर बातें करते हैं और एक दूसरे के साथ अपनी खुशी और गम भी साझा करते हैं। बाजारों और प्रमुख रास्तों पर सामान्य दिनों की तरह आवाजाही रहती है। लोग अपने काम से निकलते हैं, देर शाम तक खरीदारी करते हैं और घर लौटते हैं। अब वहां से हिंसा की निशानियां मिट चुकी हैं।