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संतकबीर नगर में सोने की तलाश में नियारा की राख से भूमि को बना रहे ऊसर, बाट रहे कैंसर

Updated: Fri, 14 Aug 2026 03:10 PM (GMT+05:30)

संतकबीरनगर में नियारा की राख से भूजल और हवा प्रदूषित हो रही है, जिससे कैंसर और सांस संबंधी बीमारियों का खतरा बढ़ गया है। खतरनाक रसायनों के उपयोग और अपशिष्ट के अनुचित निपटान के कारण मिट्टी भी ऊसर बन रही है, जिस पर तत्काल जांच और निगरानी की आवश्यकता है।

नियारा गलाने के लिए जल रही भट्ठियों से फैल रहा विषाक्त धुंआ। जागरण

नियारा गलाने के लिए जल रही भट्ठियों से फैल रहा विषाक्त धुंआ। जागरण

HighLights

  1. नियारा की राख से भूजल और मिट्टी प्रदूषित हो रही।

  2. भट्ठियों से निकलने वाला धुआं स्वास्थ्य पर बुरा असर डाल रहा।

  3. खतरनाक रसायनों के उपयोग पर जांच और निगरानी जरूरी।

एसके सिंह, संतकबीरनगर। जिस नियारा में सोने-चांदी की चमक खोजी जा रही है, उसका दूसरा पहलू चिंता बढ़ाने वाला है। राख की धुलाई के बाद निकलने वाले रासायनिक अवशेष तथा भट्ठियों में गलाने पर विषाक्त धुएं जमीन, पानी और हवा की गुणवत्ता को प्रभावित कर रहे हैं। खुले में डंप राख पर बारिश का पानी पड़ने से घुलनशील तत्व मिट्टी के रास्ते भूजल तक पहुंच सकते हैं। इससे न केवल उपजाऊ भूमि के ऊसर बनने बल्कि प्रदूषित जल के सेवन से कैंसर जैसी खतरनाक बीमारी से ग्रसित होने का भी खतरा है।

पूर्वांचल में नियारा के बड़े कारोबार के लिए पहचान रखने वाले बखिरा कस्बे और आसपास के आधा दर्जन गांवों में करीब चार सौ परिवार इस काम से जुड़े हैं। नेपाल, बिहार और उत्तर प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों से सराफा दुकानों की राख यहां लाई जाती है।

सुनार की दुकानों और कारखानों से निकलने वाली धूल, राख और घिसाई के कचरे को नियारा कहा जाता है। इसमें सोने-चांदी के बेहद महीन कण छिपे होते हैं। राख को पहले पोखरों के किनारे पानी से धोया जाता है। भारी कण नीचे बैठने के बाद बची सामग्री को सुखाकर आगे की प्रसंस्करण प्रक्रिया में भेजा जाता है। इसके बाद रिफाइनरी और भट्ठियों की प्रक्रिया से कीमती धातुएं अलग की जाती हैं।

मिट्टी और जल दोनों की सेहत पर खतरा
अवशेष के निस्तारण की उचित व्यवस्था न होने से इससे जुड़े कारोबारी जगह-जगह गड्ढा खोदकर डंप कर रहे हैं। खुले में डंप नियारा बारिश होने पर खतरनाक रासायनिक अवशेषों को मिट्टी तक पहुंचा सकता है। इसको लेकर मिट्टी के रासायनिक गुण और पानी में पीएच संतुलन बिगड़ने का खतरा है। हालांकि बखिरा क्षेत्र में मिट्टी में प्रदूषण का स्तर कितना है, इसका वैज्ञानिक आंकड़ा अभी उपलब्ध नहीं है। इसलिए डंपिंग स्थलों और आसपास के खेतों से मिट्टी के नमूने लेकर प्रयोगशाला जांच कराना जरूरी है।

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नियारा का अवशेष डंप करने के लिए गौरा में सड़क किनारे खोदा गया गड्ढा। जागरण


 

नियारा बिगाड़ रही लोगों की सेहत, गंभीर रोगों का खतरा
क्या नियारा की राख में सीसा, कैडमियम और क्रोमियम जैसे खतरनाक रसायन होते हैं। भूगर्भ जल प्रदूषित होने और लगातार ऐसे पानी का सेवन करने से स्वास्थ्य को काफी नुकसान पहुंच सकता है। यहां तक कि गुर्दे और तंत्रिका तंत्र खराब हो सकते हैं। प्रदूषित जल के सेवन से कैंसर का जोखिम भी बढ़ सकता है। हालांकि बखिरा में नियारा के कारण भूजल में इन तत्वों की मौजूदगी और उससे स्वास्थ्य पर असर है या नहीं, यह स्थानीय स्तर पर पानी की जांच और स्वास्थ्य अध्ययन के बाद ही स्पष्ट होगा।

भट्ठियों का धुआं बढ़ा रहा सांसों की परेशानी
लेडुआ महुआ पावर हाउस और झुंगिया रोड के आसपास आबादी के बीच नियारा गलाने वाली कई भट्ठियों से निकलने वाला धुआं कई बार आसपास के घरों तक पहुंचता है। धुएं में मौजूद सूक्ष्म कण और अन्य प्रदूषक लंबे समय तक सांस के साथ शरीर में पहुंचें तो फेफड़ों और श्वसन तंत्र पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है।

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कारोबारी क्षेत्र में आंखों में जलन, खांसी और सांस लेने में परेशानी जैसी शिकायतें आम हैं। हालांकि इन स्वास्थ्य समस्याओं का सीधा कारण भट्ठियों का धुआं है या नहीं, यह चिकित्सकीय और पर्यावरणीय जांच के बाद ही स्पष्ट होगा।

कौन से रसायन हो रहे इस्तेमाल, जांच जरूरी
धातु शोधन की अलग-अलग प्रक्रियाओं में नाइट्रिक अम्ल, हाइड्रोक्लोरिक अम्ल और अन्य रसायनों का इस्तेमाल होता है। कुछ प्रक्रियाओं में अत्यधिक विषैले रसायन भी प्रयुक्त होते हैं। लेकिन बखिरा में नियारा के प्रसंस्करण में वास्तव में कौन-कौन से रसायन इस्तेमाल हो रहे हैं, इसकी स्थानीय स्तर पर पुष्टि जरूरी है।
प्रशासन को भट्ठियों और प्रसंस्करण इकाइयों का सर्वे कर यह पता करना चाहिए कि रसायनों का इस्तेमाल और भंडारण किस तरह हो रहा है तथा अपशिष्ट का निस्तारण कहां किया जा रहा है।

नियारा की राख और उसके निस्तारण की क्या व्यवस्था है, इसकी जानकारी नहीं है। जल्द ही मौके पर जाकर स्थिति देखी जाएगी। नियम विरुद्ध चल रही भट्ठियों को चिह्नित कर आवश्यक कार्रवाई की जाएगी।

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सीमा राय, अधिशासी अधिकारी, नगर पंचायत बखिरा

नियारा की राख की तालाब के पानी से धुलाई व अवशेष को खुले में गड्ढा खोद कर डंप किए जाने की जानकारी नहीं है। यदि ऐसा हो रहा है तो यह गंभीर विषय है। मानकों के तहत ही कारोबार संचालित होना चाहिए। भूमि व भूगर्भजल की जांच के साथ निस्तारण के लिए अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं।

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-आलोक कुमार, डीएम

नियारा से धातु निकालने के बाद बचा अवशेष यदि खेतों, पोखरों या खाली जमीन पर खुले में डाल दिया जाता है तो उसमें मौजूद धातु और रासायनिक तत्व दोबारा मिट्टी और पानी में पहुंच सकते हैं। राख, धुलाई के पानी और अंतिम अवशेष तीनों के सुरक्षित निस्तारण की व्यवस्था जरूरी है।

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-डा. हरियोम बख्शी, बखिरा