Trending

    विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

    सिद्धार्थनगर में रेल लाइन बनी किसानों के लिए मुसीबत, 200 बीघा धान की फसल डूबी

    Updated: Thu, 23 Jul 2026 11:37 AM (IST)

    सिद्धार्थनगर के खेसरहा में नई रेल लाइन के निर्माण से पानी का पुराना रास्ता बंद हो गया, जिससे करीब 200 बीघा धान की फसल जलमग्न हो गई है। किसानों ने चंदा ...और पढ़ें

    निर्माणाधीन स्टेशन के पास प्रदर्शन। जागरण

     निर्माणाधीन स्टेशन के पास प्रदर्शन। जागरण

    HighLights

    1. रेलवे ट्रैक ने रोका पानी का रास्ता, फसलें डूबीं।

    2. किसानों ने चंदा कर खुद खोदा निकासी मार्ग।

    3. स्थायी जल निकासी के लिए पुलिया बनाने की मांग।

    संवाद सूत्र, खेसरहा, (सिद्धार्थनगर)। विकास की नई रेल लाइन बतसा और सवाडाड़ के किसानों के लिए इस बरसात में मुसीबत बन गई है। रेलवे ट्रैक के लिए की गई मिट्टी पटाई से बरसाती पानी के निकास का पुराना रास्ता बंद हुआ तो दोनों गांवों के सीवान में करीब 200 बीघा धान की फसल पानी में डूब गई। खेतों में कई दिनों से पानी जमा रहने के कारण फसल के सड़ने का खतरा बढ़ गया है।

    हालात से परेशान किसानों को पानी निकालने के लिए खुद चंदा जुटाकर ट्रैक के हिस्से की खुदाई करानी पड़ी। बुधवार को किसानों ने निर्माणाधीन रेलवे स्टेशन के पास प्रदर्शन कर स्थायी जलनिकासी के लिए तत्काल पुलिया बनाने की मांग उठाई।

    बतसा और सवाडाड़ के सीवान का बरसाती पानी पहले प्राकृतिक ढाल के सहारे पीढ़िया गांव की ओर निकल जाता था। ग्रामीणों के अनुसार रेलवे ट्रैक के निर्माण के लिए बड़े पैमाने पर मिट्टी पटाई होने से पानी निकलने का यह रास्ता बंद हो गया।

    तेज बारिश हुई तो पानी खेतों में जमा होता चला गया और देखते ही देखते धान के खेत तालाब में बदल गए। जिन किसानों ने लागत लगाकर रोपाई पूरी की थी, उनकी फसल अब कई दिनों से पानी में डूबी है। किसानों का आरोप है कि समस्या सामने आने के बाद ट्रैक के करीब दो मीटर हिस्से की खुदाई कर पानी निकालने का प्रयास किया गया, लेकिन निकासी पर्याप्त नहीं हुई।

    खबरें और भी

    पानी लगातार खेतों में भरा रहा तो ग्रामीणों ने आपस में चंदा एकत्र किया और दोबारा खुदाई कराकर निकासी का रास्ता चौड़ा कराया। इसके बाद कुछ पानी निकलना शुरू हुआ, लेकिन खेतों में अब भी जलभराव की स्थिति बनी हुई है। ग्रामीणों का कहना है कि हर बारिश में रेलवे ट्रैक को काटकर पानी निकालना न तो सुरक्षित है और न स्थायी समाधान।

    रेल परियोजना के सर्वे और मिट्टी पटाई के समय ही प्राकृतिक जलनिकासी का आकलन किया जाना चाहिए था। यदि इस स्थान पर पहले ही पुलिया बना दी जाती तो करीब 25 किसानों की फसल जलमग्न होने की नौबत नहीं आती। किसान चंद्रशेखर, अंगद, प्रिंस और चंद्रेश यादव सहित अन्य ग्रामीणों ने कहा कि रेलवे लाइन क्षेत्र के विकास के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन विकास की कीमत किसानों की फसल नहीं होनी चाहिए। ट्रैक निर्माण के साथ जलनिकासी की स्थायी व्यवस्था करना भी जरूरी है।

    यह भी पढ़ें- ककरहवा सीमा पर दो घंटे घटा कस्टम का टाइम, यात्रियों की बढ़ेगी मुश्किल, अब रात 8 बजे की नहीं; शाम 6 बजे तक बनेगी नई भंसार


    किसी की 20 तो किसी की 15 बीघा फसल पानी में
    जलभराव का सबसे अधिक असर उन किसानों पर पड़ा है, जिनकी खेती ट्रैक के आसपास है। चंद्रशेखर की 20 बीघा, राजकुमार की 15 बीघा, अंगद और प्रिंस की पांच-पांच बीघा तथा गोविंद की तीन बीघा धान की फसल प्रभावित हुई है।

    ग्रामीणों के अनुसार, करीब 25 किसानों की कुल 200 बीघा से अधिक फसल जलभराव की चपेट में है। किसानों ने चेतावनी दी है कि यदि स्थायी जलनिकासी के लिए जल्द पुलिया निर्माण की प्रक्रिया शुरू नहीं हुई तो वे आंदोलन के लिए बाध्य होंगे।