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वर्चअल दुनिया की गिरफ्त में आ रहे जेन अल्फा, मोबाइल को मान रहे हैं अपना गुरु; टास्क में दे रहे जान

Published: Thu, 03 Sep 2026 05:16 PM (IST)

Gen Alpha in girp of virtual world: छात्र ऋषभ के इंटरनेट पर वीडियो देखने के बाद आत्मघाती कदम उठाने की ...और पढ़ें

इंटरनेट पर वीडियो देखने के बाद आत्मघाती कदम उठाने वाला छात्र ऋषभ

इंटरनेट पर वीडियो देखने के बाद आत्मघाती कदम उठाने वाला छात्र ऋषभ

HighLights

  1. जेन अल्फा में बढ़ता स्क्रीन टाइम और निगरानी में शिथिलता, बना रही उनको कमजोर

  2. सीतापुर में कक्षा दस के छात्र ने 31 अगस्त को कर ली थी आत्महत्या

  3. मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य की सुरक्षा बनी चुनौती

जगदीप शुक्ल, सीतापुर। बच्चे के हाथ में थमाया गया मोबाइल अब सिर्फ पढ़ाई या मनोरंजन का साधन नहीं रह गया है। परिवार में संवाद घटा तो स्क्रीन बच्चों की दुनिया बन गई। अभिभावकों की निगरानी में शिथिलता आई तो यही दुनिया खतरे का दरवाजा खोलने लगी।

वर्ष 2010 के बाद जन्मे बच्चों (जेन अल्फा) का बढ़ता स्क्रीन टाइम अब उनके मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए चुनौती बन रहा है। चिड़चिड़ापन, गुस्सा, सिरदर्द, भूख में कमी और आंखों में मायोपिया जैसी समस्याएं सामने आ रही हैं। इससे भी गंभीर यह है कि इंटरनेट पर दिखने वाले जोखिम भरे वीडियो बच्चों के व्यवहार को प्रभावित कर रहे हैं।

महोली के उरदौली में 31 अगस्त को कक्षा 10 के छात्र ऋषभ के इंटरनेट पर वीडियो देखने के बाद आत्मघाती कदम उठाने की घटना ने डिजिटल निगरानी की जरूरत को गंभीरता से सामने ला दिया है। इससे यह भी साबित हो रहा है कि जेन अल्फा वर्चअल दुनिया की गिरफ्त में आ रही है।

कम हो रही शारीरिक गतिविधियां

लगातार स्क्रीन देखने से बच्चों की शारीरिक गतिविधियां कम हो रही हैं। आउटडोर खेल का समय घटने के साथ नींद, भूख और एकाग्रता प्रभावित हो रही है। विशेषज्ञ अत्यधिक स्क्रीन इस्तेमाल को बच्चों में चिड़चिड़ापन, गुस्सा और सिरदर्द जैसी समस्याओं से जोड़ते हैं।

बढ़ता है मायोपिया का जोखिम

लंबे समय तक नजदीक से स्क्रीन देखने से मायोपिया(निकट दृष्टिदोष) का जोखिम भी बढ़ता है। पिछले दो वर्ष में आंख अस्पताल में 16,321 मायोपिया के केस आ चुके हैं। आंख अस्पताल के डॉ. श्रीकांत वाईकर ने बताया कि पांच से दस वर्ष के बच्चों में मायोपिया की समस्या बढ़ रही है।

अकेलापन दूर करने का साथी बना मोबाइल

मनोरोग चिकित्सक डॉ. अवधेश वर्मा ने बताया कि माता-पिता की व्यस्तता और बच्चों के साथ बातचीत का समय कम होने से मोबाइल उनका आसान साथी बन गया है। शुरुआत कुछ मिनटों से होती है और वीडियो प्लेटफार्मों पर लगातार नए कंटेंट मिलने के कारण स्क्रीन टाइम घंटों तक पहुंच जाता है। कई अभिभावक इस बात की निगरानी नहीं कर पाते कि बच्चा मोबाइल पर क्या देख रहा है, क्या सर्च कर रहा है और किस तरह की सामग्री उसके व्यवहार को प्रभावित कर रही है।

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