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    कथक कलाकार आशीष सिंह: संघर्षों से वृंदावन तक, हिमालय में बिखेर रहे नृत्य की छनक

    Updated: Sat, 18 Apr 2026 08:53 AM (IST)

    वाराणसी के कथक कलाकार आशीष सिंह ने अपने संघर्षों को बांके बिहारी को समर्पित किया है। पंडित बिरजू महाराज की शिष्या संगीता सिन्हा से प्रशिक्षित आशीष ने ...और पढ़ें

    कथक प्रशिक्षक आशीष सिंह। जागरण

    कथक प्रशिक्षक आशीष सिंह। जागरण

    जागरण संवाददाता, वाराणसी। काशी की कलाकार प्रसूता धरती ने अनेक ऐसे युवाओं को जन्म दिया है जो पूरे समर्पण भाव से भारतीय शास्त्रीय कला को आगे बढ़ाने के लिए निरंतर लगे हुए हैं। इनमें से एक हैं कथक प्रशिक्षक आशीष सिंह। नितांत संघर्षों की उपज इस सितारे की चमक जब प्रसिद्धि के आसमान में फैली तो बालीवुड से लेकर पड़ोसी देश चीन और अनेक देश इस प्रतिभा से चमत्कृत हुए बिना नहीं रह सके लेकिन श्रेय का पथ छोड़ प्रेय के पथ पर निकले इस कला साधक ने अपने संघर्षाें की चमक को बांके बिहारी के चरणों में अर्पित कर दिया है और वृंदावन में रहते हुए 'नृत्य मंजरी दास' की उपाधि पाई।

    अब बांके बिहारी की नृत्य सेवा के अतिरिक्त आशीष दुर्गम हिमालय के क्षेत्रों में खाटी मैदान की इस कथक नृत्य शैली के घुंघरुओं की छनक बिखेर रहे हैं और पहाड़ी युवाओं को नृत्य की इस विधा में पारंगत करते हुए कथक को अटक से कटक तक और कश्मीर से कन्याकुमारी तक फैलाने का संकल्प लिए अनवरत चले जा रहे हैं।

    काशी के कबीरचौरा में जन्मे आशीष सिंह बहुत वर्षों के बाद अपने माता पिता को प्राप्त हुए थे, इस खुशी में दादी के बहन के बेटे गायक स्वर्गीय सुनील सिंह ने संगीत का आयोजन किया। जिसमें बागेश्वरी देवी, सुनील सिंह, कथक नृत्यांगना सरला नारायण सिंह ने अपनी प्रस्तुतियां दीं।

    कथक नृत्य प्रस्तुति के दौरान नृत्यांगना ने आशीष को अपने गोद में लेकर होली नृत्य किया था, शायद यहीं से नवजात आशीष के अंदर कथक नृत्य का बीजारोपण हो गया था।

    आशीष जैसे जैसे बड़े होते नृत्य करते, उन्हें कथक नृत्य ही आकर्षित करता था, पर दादाजी को ये बातें नागवार गुजरतीं, और इसके लिए उन्होंने इनकी पिटाई भी की। ठाकुर राजपूत परिवार में छक्का पैदा होने का ताना भी सुनना पड़ा लेकिन आशीष ने हार नही मानी। नृत्य के जुनून ने उन्हें रुकने नहीं दिया।

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    सीखने की ललक ने उन्हें बनारस में पद्म विभूषण पंडित बिरजू महाराज की एकमात्र शिष्या संगीता सिन्हा के पास पहुंचा दिया। काशी हिंदू विश्वविद्यालय के संगीत एवं मंच कला संकाय से कथक नृत्य में स्नातक और स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त कर आशीष अपनी साधना पथ पर बढ़ चले।

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    देश के सभी प्रमुख मंचों पर छोड़ी अपनी छाप
    आशीष ने संकट मोचन संगीत समारोह, शिवरात्रि संगीत महोत्सव, बौद्ध महोत्सव, महामृत्युंजय महोत्सव, कथक महोत्सव, गीतांजलि महोत्सव ( नासिक, मुंबई) हंडिया माटी कथक महोत्सव, प्रयागराज, शिवरात्रि संगीत समारोह भदोही, महाकुंभ पर्व प्रयागराज, श्रीरामजन्म भूमि जन्मोत्सव व रामोत्सव अयोध्या, बिहार महोत्सव आदि में अपनी प्रस्तुतियां देकर अपनी कला का लोहा मनवाया। अनेक अखिल भारतीय शास्त्रीय नृत्य की प्रतियोगिताओं जैसे प्रयाग संगीत समिति, प्रयागराज संगीत नाटक अकादमी, लखनऊ संगीत कला केंद्र, आगरा, काशी हिंदू विश्वविद्यालय के 'स्पंदन' में प्रथम स्थान प्राप्त किया। काशी के साथ-साथ देश के अनेक प्रमुख शहरों में मंचों पर कथक की चमक बिखेरी।

    विदेशों में भी गूंजी घुंघरुओं की झंकार
    आशीष ने अंतरराष्ट्रीय मंच (दी सेकेंड सिल्क रोड इंटरनेशनल आर्ट फेस्टिवल चाइना 2015) में भी अपनी प्रस्तुति दी। जिसमें चाइना के सियान के एक दर्जन मंचों पर अपनी कला का प्रदर्शन किया।

    मिले ढेरों सम्मान

    • काशी प्रतिभा सम्मान, वाराणसी 2002
    • बाल प्रतिभा सम्मान, वाराणसी 2005
    • नवोदित कलाकर सम्मान, वाराणसी 2005
    • सुर गंगा कला निधि सम्मान, न्यू टिहरी, उत्तराखंड 2019
    • ब्रज श्याम सम्मान, राजनंद गांव छत्तीसगढ़ 2023
    • संगीत गुणज्ञ सम्मान, आगरा 2025


    जारी है कथक यात्रा
    आशीष आज कथक नृत्य की प्राचीन परंपरा को कथक कार्यशाला के माध्यम से वृंदावन के साथ साथ पिहानी, हरदोई, लखनऊ, जयपुर विश्वविद्यालय, भीलवाड़ा, चित्तौड़गढ़, पुणे, नासिक, महाराष्ट्र के अन्य शहरों समेत उत्तराखंड के दुर्गम स्थानों अल्मोड़ा, नैनीताल, देहरादून, जोशीमठ, हरिद्वार पिथौरागढ़, श्रीनगर, गढ़वाल, टिहरी गढ़वाल आदि में जाकर कथक के घुघरुओं की छनक बिखेरते हुए नई पीढ़ी को तैयार कर रहे हैं।

    प्रस्तुति : शैलेश अस्थाना