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महाश्‍मशान मण‍िकर्णि‍का पर नगर वधुओं का राग व‍िराग का मेला, च‍िताओं की आंच पर भारी चैत्र नवरात्र की सप्तमी वाली रात की रवानी

By shailesh asthanaEdited By: Abhishek sharma
Published: Wed, 25 Mar 2026 07:13 PM (IST)

चैत्र नवरात्र की सप्तमी पर वाराणसी के महाश्मशान मणिकर्णिका घाट पर नगर वधुएं बाबा मसाननाथ को नृत्यांजलि अर्पित करती हैं। यह त्रिदिवसीय श्रृंगार महोत्सव का समापन होता है।

HighLights

  1. चैत्र नवरात्र सप्तमी पर मणिकर्णिका में नगर वधुओं का नृत्य।

  2. राजा मानसिंह ने 14वीं सदी में शुरू की यह परंपरा।

  3. जीवन-मृत्यु चक्र, काशी की सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक।

जागरण संवाददाता, वाराणसी। चैत्र नवरात्र की सप्तमी की रात काशी में एक अद्वितीय अनुभव प्रस्तुत करती है। इस रात महाश्मशान मणिकर्णिका पर चिताओं की आंच जलती है, वहीं नगर की वधुएं बाबा मसाननाथ को नृत्यांजलि अर्पित करती हैं। महाश्मशान पर पंचमी से सप्तमी तक चलने वाले महाश्मशान नाथ जी (मणिकर्णिका घाट) के त्रिदिवसीय श्रृंगार महोत्सव का समापन भी इसी आयोजन के साथ होता है।

आयोजन के अंतिम दिन, तांत्रिक विधि से पूजन और अभिषेक के बाद, रात्रि नौ बजे नगर वधुओं की नृत्यांजलि आरंभ होती है। इस समय राग विराग की नगरी काशी महाश्मशान में जीवंत हो उठती है। आयोजन से पूर्व महाश्मशान की महाआरती की जाती है, और परंपरागत रूप से चिताओं की आंच के बीच राग विराग का मेला सजता है।

ऐतिहासिक मान्यता के अनुसार, 14वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में काशी आए राजा मानसिंह ने मणिकर्णिका तीर्थ पर स्थित जीर्ण-शीर्ण श्मशान नाथ मंदिर का जीर्णोद्धार कराया। इस अवसर पर धार्मिक अनुष्ठानों के बाद नगर के संगीतज्ञों को मंगल उत्सव में आमंत्रित किया गया। दुर्भाग्यवश, कुछ पूर्वाग्रह के चलते स्थापित कलाकारों ने इस उत्सव में भाग लेने से मना कर दिया। राजा मानसिंह इस स्थिति से व्यथित हुए और बिना उत्सव आयोजित किए ही दिल्ली लौटने की तैयारी करने लगे।

काशी के पुरनिये बताते हैं कि जब यह समाचार नगर वधुओं तक पहुंचा, तो उन्होंने अपने आराध्य नटराज स्वरूप महाश्मशानेश्वर नाथ की महफिल सजाने का एकमत निर्णय लिया। उन्होंने राजा को संदेश भेजा कि वे उत्सव सजाने के लिए न केवल तैयार हैं, बल्कि इसके लिए आतुर भी हैं। इस संदेश को पाकर राजा मानसिंह प्रसन्न हुए और उन्होंने ससम्मान रथ आदि भेजकर नगर वधुओं को उत्सव में बुलवाया। तभी से यह परंपरा आरंभ हुई और आगे जाकर काशी की एक महत्वपूर्ण रीति के रूप में स्थापित हो गई।

इस आयोजन में नगर वधुओं द्वारा प्रस्तुत नृत्य केवल एक सांस्कृतिक उत्सव नहीं है, बल्कि यह काशी की समृद्ध परंपरा और धार्मिक आस्था का प्रतीक भी है। महाश्मशान में चिताओं की आंच के बीच नृत्य का यह आयोजन जीवन और मृत्यु के चक्र को दर्शाता है। नगर वधुएं अपनी कला के माध्यम से न केवल श्रद्धा अर्पित करती हैं, बल्कि इस अवसर पर काशी की सांस्कृतिक धरोहर को भी जीवित रखती हैं।

इस विशेष रात में, जब चिताओं की आंच जलती है, तब नगर वधुएं अपने नृत्य से वातावरण को जीवंत बना देती हैं। यह नृत्य केवल मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि यह एक गहरी आध्यात्मिक अनुभूति का भी हिस्सा है। काशी की यह परंपरा न केवल धार्मिक आस्था को प्रकट करती है, बल्कि यह समाज के विभिन्न वर्गों को एक साथ लाने का कार्य भी करती है।

महाश्मशान नाथ का यह महोत्सव काशीवासियों के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर है, जहां वे अपने पूर्वजों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं और साथ ही अपनी सांस्कृतिक धरोहर को भी संजोते हैं। इस आयोजन के माध्यम से काशी की पहचान और उसकी सांस्कृतिक विविधता को भी प्रदर्शित किया जाता है।

चैत्र नवरात्र की सप्तमी की रात काशी में एक अद्वितीय अनुभव प्रस्तुत करती है, जो न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि काशी की सांस्कृतिक धरोहर को भी जीवित रखती है। यह आयोजन न केवल काशीवासियों के लिए, बल्कि देशभर के श्रद्धालुओं के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर है, जहां वे अपनी आस्था और संस्कृति को एक साथ अनुभव कर सकते हैं। काशी की यह परंपरा न केवल एक धार्मिक अनुष्ठान है, बल्कि यह जीवन के विभिन्न पहलुओं को जोड़ने का एक माध्यम भी है। महाश्मशान में होने वाला यह आयोजन काशी की आत्मा को प्रकट करता है और इसे एक अद्वितीय पहचान प्रदान करता है।

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