बाबा काशी विश्वनाथ को अक्षय तृतीया से रजत जलधारी से दी जाएगी शीतलता, गर्मी में सदियों पुरानी है परंपरा
वाराणसी के बाबा विश्वनाथ मंदिर में अक्षय तृतीया से रजत जलधारी स्थापित की जाएगी। यह सदियों पुरानी परंपरा ग्रीष्मकाल में भगवान भोलेनाथ को शीतलता प्रदान ...और पढ़ें

वाराणसी में बाबा विश्वनाथ को अक्षय तृतीया से रजत जलधारी से मिलेगी शीतलता।
HighLights
अक्षय तृतीया से बाबा विश्वनाथ को रजत जलधारी से मिलेगी शीतलता।
सदियों पुरानी परंपरा, गंगाजल, गुलाब जल, इत्र से होगा अभिषेक।
ग्रीष्मकाल में भगवान भोलेनाथ को गर्मी से राहत प्रदान की जाएगी।
जागरण संवाददाता, वाराणसी। आखिरकार परंपराओं के क्रम में बाबा काशी विश्वनाथ के लिए एक अनोखी सदियों पुरानी परंपरा का पालन करने की पावन तिथि आ रही है। शाख-ज्येष्ठ और आषाढ़ की तीव्र गर्मी में भगवान भोले आदि विश्वेश्वर बाबा विश्वनाथ को शीतलता प्रदान करने के लिए भक्तों द्वारा ग्रीष्मकाल में रजत जलधारी (फव्वारा) का आयोजन किया जाएगा। यह जलधारी वैशाख शुक्ल पक्ष की तृतीया, जिसे अक्षय तृतीया कहा जाता है, से लेकर श्रावण मास की पूर्णिमा तक निरंतर बाबा विश्वनाथ महादेव को गंगाजल, गुलाब जल और इत्र की फुहार से शीतल रखेगी।
जलधारी वास्तव में चांदी का एक फव्वारा है, जिसे भक्त गर्मी के मौसम में बाबा विश्वनाथ के शिवलिंग के ऊपर स्थापित करते हैं। यह जलधारी परिसर में स्थित एक जलटैंक से जुड़ी होती है, जिसमें पाइप के माध्यम से गंगाजल निरंतर पहुंचता रहता है। इसके साथ ही, इसमें गुलाब जल और इत्र का मिश्रण भी किया जाता है।
भक्तों द्वारा भगवान को लंगड़ा आम का भोग भी इस दौरान सीजन में अर्पित किया जाता है। मंदिर के अर्चक चेत नारायण ने बताया कि अक्षय तृतीया से ग्रीष्म ऋतु का प्रभाव और भी तीव्र हो जाता है, जिसे देखते हुए बाबा विश्वनाथ के गर्भगृह में जलधारी लगाई जाती है। इस जलधारी के माध्यम से गंगाजल से अटूट जल की धारा से बाबा का अभिषेक किया जाता है। परंपरा के अनुसार, मध्यान भोग आरती के बाद से पूरे दिन इस जलधारी से बाबा का अभिषेक किया जाता है।
जलधारी की यह परंपरा सदियों पुरानी है। जब से मंदिर का निर्माण हुआ है, तब से हर साल बाबा पर जलधारी लगाई जाती है। माना जा रहा है कि यह परंपरा लगभग 300 वर्षों से से भी अधिक समय से चली आ रही है। भक्तों का मानना है कि इस जलधारी के माध्यम से भगवान भोलेनाथ को गर्मी से राहत मिलती है और भक्तों की श्रद्धा और भक्ति का प्रतीक है। मंदिर प्रशासन भी इस बाबत सप्ताह भर बाद शुरू होने वाले इस आयोजन की तैयारियों में जुट गया है।
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इस वर्ष भी भक्तों की संख्या में वृद्धि की उम्मीद है, जो इस धार्मिक अनुष्ठान में भाग लेने के लिए उत्सुक हैं। जलधारी का यह आयोजन न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह भक्तों के लिए एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक गतिविधि भी है। भक्तों का मानना है कि इस जलधारी के माध्यम से उन्हें मानसिक और आध्यात्मिक शांति प्राप्त होती है।