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    मेष राशि में सूर्य आने से खरमास समाप्त, वैवाहिक लग्न की छह दिन बाद से होगी शुरुआत

    By Vns Shailesh Asthana Edited By: Abhishek sharma
    Updated: Mon, 13 Apr 2026 05:07 PM (IST)

    मंगलवार को सूर्य के मेष राशि में प्रवेश करते ही खरमास समाप्त हो जाएगा। इसे मेष संक्रांति या सतुआ संक्रांति के रूप में मनाया जाएगा, जिसके साथ मांगलिक क ...और पढ़ें

    मेष संक्रांति से खरमास समाप्त, वाराणसी में वैवाहिक लग्न 20 अप्रैल से शुरू।

    मेष संक्रांति से खरमास समाप्त, वाराणसी में वैवाहिक लग्न 20 अप्रैल से शुरू।

    HighLights

    1. सूर्य के मेष राशि में प्रवेश से खरमास समाप्त।

    2. मांगलिक कार्य आरंभ, वैवाहिक लग्न 20 अप्रैल से।

    3. सिख समुदाय वैशाखी पर्व मनाएगा, गुरुद्वारों में आयोजन।

    जागरण संवाददाता, वाराणसी। प्रकृति के प्रत्यक्ष देवता सूर्य मंगलवार की सुबह 11:45 बजे मीन से मेष राशि में प्रवेश कर जाएंगे। इसके साथ ही खरमास समाप्त हो जाएगा और सनातन धर्मावलंबी मेष संक्रांति को सतुआ संक्रांति या सतुआन के रूप में मनाएंगे। सिख समुदाय के लोग भी नूतन वस्त्र धारण कर वैशाखी पर्व का उल्लास मनाएंगे। खरमास समाप्त हो जाने के बाद मांगलिक कार्य आरंभ हो जाएंगे लेकिन वैवाहिक लग्न अभी छह दिन बाद 20 अप्रैल से आरंभ होंगे।

    बीएचयू ज्याेतिष विभाग के आचार्य प्रो. सुभाष पांडेय बताते हैं कि मेष संक्रांति पर गंगा स्नान का का खास महत्व है। मेष संक्रांति पर दान व पितरों के निमित्त तर्पण से अक्षय पुण्य प्राप्ति होती है। सूर्य के मेष राशि में रहने पर देवों-पितरों के निमित्त पानी से भरी सुराही या घड़ा, सत्तू, गुड़, पंखा आदि का दान किया जाता है, इससे समस्त पापों का क्षय होता है। इसीलिए इस पर्व को सतुआ संक्रांति भी कहा जाता है। काशी में श्रद्धालु गंगा तटों पर स्नान कर पितरों को तर्पण-अर्पण करेंगे और भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना कर अपने परिवार की सुख-समृद्धि की कामना और दान-पुण्य करेंगे।

    सतुआ बाबा आश्रम में होगा विशेष आयोजन
    सतुआ संक्रांति के दिन मंगलवार को मणिकर्णिका स्थित सतुआ बाबा आश्रम में विशेष पर्व मनाया जाता है, काफी संख्या में श्रद्धालु जुटते हैं। सतुआ संक्रांति के दिन ही प्रथम सतुआ बाबा को श्रीमहंत रणछोड़दास महाराज को बाबा श्रीकाशी विश्वनाथ ने सतुआ दान का आदेश दिया था। इसके बाद से ही सतुआबाबा पीठ इस परंपरा का निर्वाह कर रही है।

    सिख समुदाय में छाया वैशाखी का उल्लास
    सिख समाज के लिए वैशाखी का पर्व विशेष महत्व रखता है। यह फसल कटाई के बाद खुशियों का प्रतीक पर्व है, जिसे विशेष उत्साह के साथ मनाया जाता है। वैशाखी पर्व नौवें गुरु तेग बहादुर के बाद शुरू हुआ और जब उन्होंने धार्मिक स्वतंत्रता के लिए खड़े होकर इस्लाम में धर्म परिवर्तन करने से स्पष्ट मना कर दिया था। इस पर मुगल सम्राट औरंगजेब ने उनका सिर कटवा कर निर्मम हत्या करवा दी गई। गुरु के बलिदान के अतिरिक्त यह पर्व सिख धर्म के दसवें और अंतिम गुरु गोविंद सिंह के राज्याभिषेक और खालसा पंथ के संत-सिपाही समूह के गठन का स्मरण कराता है। इस दिन गुरुद्वारों में श्रद्धालु मत्था टेककर आशीर्वाद प्राप्त करेंगे। शहर के गुरुबाग और नीचीबाग स्थित गुरुद्वारों में गुरु ग्रंथ साहिब का पाठ और रागी जत्थों द्वारा शबद कीर्तन का आयोजन किया जाएगा, जिससे वातावरण भक्तिमय हो उठेगा।