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    भगवान परशुराम और रावण से भी जुड़ी है 'कांवड़ यात्रा' की अनोखी मान्‍यता, काशी के ज्‍योत‍िषाचार्य ने बताया पौराण‍िक महत्‍व

    By Dhyan chandra sharmaEdited By: Abhishek sharma
    Updated: Thu, 09 Jul 2026 03:19 PM (IST)

    कांवड़ यात्रा का पौराणिक महत्व भगवान परशुराम और रावण से भी जुड़ा है, जिसमें श्रद्धालु गंगा जल से भगवान शिव का अभिषेक करते हैं। काशी का इस यात्रा से गह ...और पढ़ें

    कांवड़ यात्रा का पौराणिक रहस्य: रावण, परशुराम और काशी का अद्भुत संबंध।

    कांवड़ यात्रा का पौराणिक रहस्य: रावण, परशुराम और काशी का अद्भुत संबंध।

    HighLights

    1. कांवड़ यात्रा का महत्व रावण और परशुराम से जुड़ा।

    2. काशी भगवान शिव का सनातन निवास, मोक्ष का द्वार।

    3. सावन में लाखों श्रद्धालु करते हैं शिव का जलाभिषेक।

    जागरण संवाददाता, वाराणसी। कांवड़ यात्रा का महत्‍व और महात्‍म्‍य पौराणि‍क है। युगों पुरानी घटनाएं यह श‍ि‍व से जुड़ी जलाभ‍िषेक की अनोखी परंपरा की कहानी कहती हैं। रानी पद्मावती तारा योगतन्त्र आदर्श संस्कृत महाव‍िद्यालय के प्राचार्य डॉ. कमलेश झा ने पौराण‍िक मान्‍यताओं में कांवड़ यात्रा के महत्‍व को बताया है। 

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    बताया क‍ि कांवड़ यात्रा भारतीय संस्कृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसमें श्रद्धालु गंगा जल लाकर भगवान शिव का अभिषेक करते हैं। लोककथाओं में यह भी कहा जाता है कि भगवान शिव का अभिषेक करने के लिए रावण भी गंगा जल ही लाता था। यह कथा अत्यंत लोकप्रिय है और इसे श्रद्धा के साथ सुनाया जाता है।

    अन्‍य कथाओं के अनुसार भगवान परशुराम और कांवड़ परंपरा भी पुरानी है। बताया क‍ि विशेषकर उत्तर प्रदेश में, यह परंपरा प्रचलित है कि भगवान परशुराम गढ़मुक्‍तेश्‍वर से गंगा जल लाकर पुराणों में वर्णित शिवलिंग का अभिषेक करते थे। यह परंपरा प्राचीन मानी जाती है और वर्तमान कांवड़ यात्रा की प्रेरणाओं में से एक मानी जाती है। हालांकि, इसका प्रत्यक्ष पुरातात्त्विक उल्लेख नहीं मिलता, लेक‍िन परंपरा आज भी कायम है।

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    काशी का अद्वितीय महत्व: सम्पूर्ण भारत में कांवड़ यात्रा का सबसे गहरा आध्यात्मिक संबंध काशी से है। स्कंदपुराण के काशीखंड में भगवान शिव स्वयं कहते हैं कि काशी उनका सनातन निवास है। यहां मृत्यु भी मोक्ष का द्वार बन जाती है। प्रसिद्ध श्लोक में कहा गया है:

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    "न काशी सदृशं क्षेत्रं न गङ्गा सदृशी नदी।
    न व‍िश्‍वेश समो देवो न मुक्‍ति‍रि‍ह दुलर्भा।।"

    अर्थात्, काशी के समान कोई क्षेत्र नहीं, गंगा के समान कोई नदी नहीं, वि‍श्वेश्‍वर के समान कोई देव नहीं और यहां मोक्ष भी दुर्लभ नहीं है। यह भाव काशीखंड में निरंतर प्रकट होता है, जो काशी की महिमा को दर्शाता है।

    कांवड़ यात्रा का आयोजन हर वर्ष सावन के महीने में होता है, जब लाखों श्रद्धालु अपने-अपने स्थानों से गंगा जल लाकर भगवान शिव का अभिषेक करते हैं। यह यात्रा न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह सामाजिक एकता और भाईचारे का भी संदेश देती है। श्रद्धालु इस यात्रा के दौरान कठिनाइयों का सामना करते हैं, लेकिन उनकी भक्ति और श्रद्धा उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती है।

    कांवड़ यात्रा के दौरान श्रद्धालु विभिन्न स्थानों पर रुककर भजन-कीर्तन करते हैं और शिव की महिमा का गुणगान करते हैं। कांवड़ यात्रा के दौरान श्रद्धालु एक-दूसरे की मदद करते हैं, जिससे समाज में भाईचारे की भावना और मजबूत होती है।

    इस प्रकार, कांवड़ यात्रा भारतीय संस्कृति का एक अभिन्न हिस्सा है, जो न केवल धार्मिक आस्था को प्रकट करती है, बल्कि सामाजिक एकता और सहयोग का भी प्रतीक है। यह यात्रा हर वर्ष लाखों श्रद्धालुओं को एकत्रित करती है और उन्हें भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने का अवसर प्रदान करती है।

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    श‍िवतांडव के रचनाकार

    त्रेतायुग में शिव तांडव स्तोत्र को रचने वाले उनके परम भक्त लंकापति रावण भी श‍िव को आराध्‍य मानता रहा। रावण द्वारा रचित भगवान शिव की स्तुति का एक परम शक्तिशाली और चमत्कारी स्तोत्र माना गया है। जब रावण का अहंकार का मर्दन हुआ और उसका हाथ कैलाश पर्वत के नीचे दब गया, तब उसने महादेव को प्रसन्न करने और क्षमा याचना के लिए अत्यंत तीव्र और लयबद्ध छंदों में इस स्तोत्र की रचना की थी।