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    वाराणसी की अनीता और पूनम की आत्मनिर्भरता: ई-रिक्शा से बदली तकदीर, मजबूत हुए रिश्ते

    By Raghvendra ShuklaEdited By: Abhishek sharma
    Updated: Thu, 06 Aug 2026 12:59 PM (GMT+05:30)

    वाराणसी की अनीता और पूनम ने आर्थिक तंगी और सामाजिक बंदिशों से लड़कर राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन से जुड़कर ई-रिक्शा चलाए। उनकी मेहनत ने न केवल उन्हे ...और पढ़ें

    वाराणसी में लड़कर लांघी घर की दहलीज और सफलता ने जोड़े आटो की गत‍ि से रिश्ते।

    वाराणसी में लड़कर लांघी घर की दहलीज और सफलता ने जोड़े आटो की गत‍ि से रिश्ते।

    HighLights

    1. अनीता और पूनम ने आर्थिक तंगी से लड़कर ई-रिक्शा चलाए।

    2. राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन से जुड़कर बनीं आत्मनिर्भर।

    3. उनकी सफलता ने परिवार के रिश्ते मजबूत किए, बनीं प्रेरणा।

    राघवेन्द्र शुक्ल, जागरण, वाराणसी। खुदी को कर बुलंद इतना कि हर तकदीर से पहले... खुदा बंदे से खुद पूछे बता तेरी रजा क्या है....। अल्लामा इकबाल का यह शेर इंसान की कड़ी मेहनत, आत्म-विश्वास व क्षमता को पहचान कर तकदीर लिखने का संदेश देता है। यह शेर वाराणसी की अनीता और पूनम की कहानी पर सटीक बैठता है। दोनों की कहानी एक जैसी है।

    जब घर में पैसे की तंगी हुई, तो उन्होंने बंदिशों की बेड़ियां तोड़ने का साहस किया। पति ने रोका, तो उन्होंने उनसे भी लड़ाई की। दोनों नारी सशक्तीकरण की मिसाल बन गईं। एक दिन ऐसा भी आया जब पति और ससुरालियों से लड़कर उन्होंने घर की दहलीज लांघी। रिश्ता टूटने के कगार पर पहुंच गया, लेकिन उनकी दृढ़ इच्छा शक्ति ने उन्हें नारी सशक्तीकरण का प्रतीक बना दिया।

    आत्मनिर्भर भारत में आत्मनिर्भरता को अपना लक्ष्य बनाकर दोनों ने राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन से जुड़कर ई-रिक्शा खरीदा और पिंक ऑटो योजना से जुड़ गईं। कमाई होने लगी, तो रिश्ते और मजबूत हुए और पति भी उनके करीब आ गए। दोनों ने अपने-अपने पतियों को भी ई-रिक्शा खरीदकर दिए। राष्ट्रीय आजीविका मिशन की जिला समन्वयक आरती ग्रोवर कहती हैं कि योजना के तहत 72 महिलाएं ई-रिक्शा और ऑटो चलाकर आर्थिक रूप से सशक्त हो चुकी हैं।

    पिंडरा की अनीता और मुनारी की पूनम ने सामाजिक बंदिशों की परवाह नहीं की। एक समय ऐसा था जब उनका रिश्ता टूटने के कगार पर था, लेकिन आर्थिक संबल ने उन्हें जोड़ दिया। शादी के बाद से ही परिवार में आर्थिक दिक्कतें सामने आने लगीं। बच्चों की जरूरतें पूरी करना मुश्किल हो रहा था। सामाजिक बंदिशें भी थीं।

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    बाहर निकलना किसी को पसंद नहीं था। अनीता ने पति से लड़ाई की और घर की दहलीज लांघकर राष्ट्रीय आजीविका मिशन से जुड़ गईं। जब आर्थिक दिक्कतें दूर होने लगीं, तो पति और ससुराल का साथ मिल गया। अनीता बताती हैं कि प्रतिदिन 1000 से 1200 रुपये की कमाई होती है।

    पूनम ने भी अपने ससुराल में कहा कि उन्हें बाहर निकलकर काम करना है, तो घर में महाभारत शुरू हो गई। पति और ससुरालियों से खूब लड़ाई लड़नी पड़ी, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। बिना दहलीज लांघे सफलता मुश्किल थी। पूनम ने ई-रिक्शा के जरिए अच्छी कमाई की, जिससे पति भी उनके साथ आ गए। उन्होंने भी एक ई-रिक्शा खरीदकर दिया। अब दोनों आर्थिक रूप से मजबूत हैं।

    अनीता और पूनम की कहानी न केवल उनकी व्यक्तिगत सफलता की कहानी है, बल्कि यह नारी सशक्तीकरण और आत्मनिर्भरता का एक प्रेरणादायक उदाहरण भी प्रस्तुत करती है। इनकी मेहनत और संघर्ष ने न केवल उनके जीवन को बदला, बल्कि उनके परिवारों के रिश्तों को भी मजबूत किया। यह कहानी उन सभी महिलाओं के लिए प्रेरणा है, जो अपने सपनों को साकार करने के लिए संघर्ष कर रही हैं।