एशिया की सबसे लंबी धार्मिक पैदल यात्रा को लेकर उत्तराखंड में विवाद, चंद वंश के युवराज ने कहा- 'परंपरा से छेड़छाड़ अस्वीकार्य'
उत्तराखंड की नंदा राजजात यात्रा को लेकर विवाद गहरा गया है। गढ़वाल समिति द्वारा यात्रा 2027 में आयोजित करने के एकतरफा फैसले का कुमाऊं में कड़ा विरोध हो ...और पढ़ें

चंद वंश के युवराज ने दिया दोनों मंडलों की संयुक्त परंपरा का हवाला। जागरण फाइल फोटो
HighLights
गढ़वाल समिति ने यात्रा 2027 में करने का निर्णय लिया
कुमाऊं ने 12 वर्षीय परंपरा अनुसार 2026 में आयोजन पर जोर दिया
युवराज ने सर्वसम्मति न होने पर कुमाऊं से यात्रा की चेतावनी दी
जासं, अल्मोड़ा। उत्तराखंड की उच्च हिमालयी क्षेत्र में आयोजित होने वाली विश्व प्रसिद्ध धार्मिक एवं ऐतिहासिक नंदा देवी राजजात यात्रा को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। हर 12 वर्षों में आयोजित होने वाली यह यात्रा 2026 में प्रस्तावित है, लेकिन नंदा देवी राजजात समिति नौटी (गढ़वाल) द्वारा एकतरफा निर्णय लेते हुए इसे 2027 में आयोजित करने की घोषणा पर कुमाऊं मंडल में कड़ा विरोध सामने आया है।
कुमाऊं के चंद वंश के युवराज नरेंद्र चंद्र राज सिंह ने स्पष्ट कहा है कि नंदा राजजात यात्रा आदिकाल से कुमाऊं और गढ़वाल के राजाओं की समान भागीदारी से संपन्न होती आई है। इसमें कुमाऊं के चंद राजाओं एवं कांस्युवा (कांसुवा) के कुंवारों की बराबर भूमिका रही है। ऐसे में कुमाऊं की नंदा राजजात समिति से बिना संवाद किए लिया गया फैसला न केवल अनुचित है, बल्कि लाखों श्रद्धालुओं की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाला है।
उन्होंने कहा कि यह यात्रा मां नंदा को उनके ससुराल (होमकुंड) के लिए विदा करने की पौराणिक परंपरा से जुड़ी है, जिसका गहरा धार्मिक व ऐतिहासिक महत्व है। परंपरा के अनुसार यात्रा का आयोजन गढ़वाल के नौटी तथा कुमाऊं के अल्मोड़ा से होता रहा है। निर्धारित 12 वर्षों के चक्र को बदलना आने वाली पीढ़ियों के लिए गलत संदेश देगा।
नरेंद्र चंद्र राज सिंह ने चेतावनी दी कि यदि सर्वसम्मति से निर्णय नहीं हुआ तो कुमाऊं मंडल से 2026 में नंदा राजजात यात्रा का आयोजन जनभावनाओं को ध्यान में रखते हुए किया जाएगा। उन्होंने प्रदेश सरकार से शीघ्र बैठक कर मामले का समाधान निकालने की मांग की और नौटी समिति से अपील की कि परंपरा के अनुरूप यात्रा 2026 में ही आयोजित की जाए।