बदरीनाथ चढ़ावे में हेराफेरी: रावलशाही पर तो अंकुश लगा, पर मनमानी अब भी जारी
बदरीनाथ धाम में चढ़ावे में हेराफेरी और मनमानी का बोलबाला है, जबकि 1939 के अधिनियम से रावलशाही पर अंकुश लगा था। ...और पढ़ें


समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
देवेंद्र रावत, गोपेश्वर। बदरीनाथ धाम में वर्ष 1939 में श्री बदरीनाथ मंदिर अधिनियम और फिर श्री बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति अधिनियम अस्तित्व में आने के बाद रावलशाही पर तो अंकुश लग गया, लेकिन बाकी व्यवस्थाएं अब भी ज्यों की त्यों हैं।
खासकर उत्तराखंड राज्य अस्तित्व में आने के बाद से तो हर स्तर पर मनमानी का बोलबाला है। यहां तक कि मंदिर समिति का ज्योतिर्मठ स्थित मुख्य कार्यालय वीरान पड़ा है और सारी व्यवस्थाएं ऋषिकेश व देहरादून से संचालित हो रही हैं।
सनातन का सर्वश्रेष्ठ तीर्थ
बदरीनाथ धाम सनातन का सर्वश्रेष्ठ तीर्थ है। जानकार बताते हैं कि धाम की प्रशासनिक और धार्मिक व्यवस्थाओं के इतिहास में वर्ष 1899 की व्यवस्था का विशेष महत्व है। 1899 के प्रस्ताव के अनुसार मंदिर का प्रबंधन मूलरूप से दक्षिण भारतीय रावल के हाथों में था।
इस व्यवस्था में टिहरी राज दरबार को मंदिर पर निगरानी लिए के कुछ अधिकार प्रदान किए गए थे। लेकिन, प्रबंधन रावल के पास होने के कारण उनके और टिहरी दरबार के बीच अक्सर अधिकारों को लेकर मतभेद पैदा हो जाते थे।
बताते हैं कि रावल जब स्वेच्छाचारी होने लगे तो वर्ष 1928 में हिंदू धार्मिक बंदोबस्ती समिति के नेतृत्व में जनआंदोलन हुआ और बदरीनाथ के यात्रा प्रबंधन को लेकर तत्कालीन संयुक्त प्रांत सरकार के सामने कुछ मांगें रखी गईं। सरकार ने धाम के माहात्म्य और जनभावनाओं का सम्मान करते हुए मंदिर व्यवस्थाओं को लेकर स्वतंत्र इकाई बनाने के लिए वर्ष 1939 में श्री बदरीनाथ मंदिर अधिनियम का विशेष राजपत्र जारी किया।
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इसी के साथ श्री बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति (बीकेटीसी) अधिनियम भी अस्तित्च में आ गया। इसमें रावलशाही पर अंकुश लगाकर सिर्फ पूजा तक रावल के अधिकार सीमित कर दिए गए। साथ ही यात्रा मार्ग और स्थानीय धार्मिक व्यवस्थाओं को सुचारू रूप से संचालित करने का निर्णय लिया गया। पांच मार्च 1941 को बीकेटीसी ने प्रस्ताव पारित कर अपना आधिकारिक मुख्यालय ज्योतिर्मठ में स्थापित किया।
वर्ष 1948 में एक संशोधन के जरिए मंदिर समिति को पूर्ण वैधानिक कारपोरेट निकाय का दर्जा दे दिया गया। स्थानीय लोगों का कहना है कि उत्तर प्रदेश के दौर तक तक तो समिति में सब-कुछ ठीक-ठाक चलता रहा, लेकिन वर्ष 2000 में पृथक उत्तराखंड राज्य बनने के बाद फिर वैसी ही मनमानी शुरू हो गई, जैसी 1939 से पूर्व देखने को मिलती थी।
दान-चढ़ावे को ठिकाने लगाने का मामला
ज्योतिर्मठ स्थित समिति का मुख्यालय महज कागजी बनकर रह गया और ऋषिकेश व देहरादून से सारी व्यवस्थाएं संचालित होने लगीं। इसी की परिणति है दान-चढ़ावे को ठिकाने लगाने का मामला।
पूर्व धर्माधिकारी भुवनचंद्र उनियाल कहते हैं कि 1939 में बदरीनाथ मंदिर के प्रबंधन को लेकर पृथक मंदिर एक्ट बनाए जाने की जरूरत इसलिए पड़ी थी कि धाम की व्यवस्थाएं पारदर्शी हो सकें। लेकिन, स्थिति यह है कि अब भी सारी व्यवस्थाएं मनमाने ढंग से संचालित हो रही हैं।